प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 17 ) नाओं को इस तरह सजाया गया है कि नाटक के अन्त तक पहुंचते-पहुंचते क्षको की प्रायः सम्पूर्ण जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है। नाटक के कथानक के भिन्न अंगों का विकास सहज रूप में हुआ है। इसकी सारी घटनाएं एक- सरे का सहज विकास है। इसके कथानक में श्रोता या दर्शक के मन में तूहल उत्पन्न करने की पूर्ण क्षमता है। इसकी घटनाएं अचानक मोड़ लेकर लोगो को सहसा चौंका देती हैं। इसमें कार्य-कारण की पूर्वापरता इस तरह व्यवस्थित की गई है कि स्थान-स्थान पर दर्शक विमुग्ध होता जाता है। कथावस्तु प्रतिमा नाटक में कुल सात अंक है। पहला अंक—अयोध्या में राम के अभिषेक की तैयारियां हो रही हैं। राजा दशरथ के आदेश से सब कुछ व्यवस्थित होता है। अचानक मंगल वाद्य बजते हुए रुक जाते हैं। इधर सीता भी परिहास में एक वल्कल वस्त्र पहनती हैं। राम उसके पास आते हैं और कहते हैं कि अचानक मेरा राजा बनना रुक गया। वहीं लक्ष्मण का भी आगमन होता है, जो आवेश में कहते हैं कि मैं संसार से सभी युवतियों को समाप्त कर दूंगा, क्योंकि एक युवती कैकेयी के ही कारण यह सब हुआ है। यहीं ये बताते हैं कि राम को 14 वर्ष के लिए वन में भी रहना पड़ेगा। सीता तथा लक्ष्मण दोनों भी राम से वन चलने की अनुमति प्राप्त कर लेते हैं। दूसरा अंक—राम के वन चले जाने के कारण राजा दशरथ अत्यन्त विकल हो जाते हैं। सभी प्राणियों को लगता है कि उनके बिना अयोध्या सूनी हो गई। कौसल्या और सुमित्रा महाराज को धैर्य बंधाती हैं। सुमन्त्र इन तीनों को रथ में बैठा कर वन में छोड़ने जाते हैं। अब भी राजा दशरथ को आशा है कि राम वापस अयोध्या लौट आयेंगे। किन्तु जब सुमन्त्र खाली रथ को लेकर आते हैं, तो दशरथ का हृदय टूट जाता है। उनके और सुमन्त्र के मध्य होने वाले वार्तालाप से अत्यन्त करुणा झलकती है। वे राम, लक्ष्मण और सीता के समाचार पूछते हुए बार-बार संज्ञाहीन हो जाते हैं। अन्त में उन्हें लगता है, मानो उन्हें ले जाने हेतु उनके पितर आ गए हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है।