BharatKosha
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary

by महाकवि भास

DevanagariHindipublished178 pages

Page 27 of 178

Read in context
Page 27

एवं उत्साह का एक समन्वित परिपाक है। उसका जीवन उच्छृंखल न। हुए भी अत्यन्त उग्र है। उसका आचरण शिष्ट संकल्प, समुचित दृढ़ता । भक्तिपूर्ण शक्ति का प्रदर्शन है। फिर भी कभी-कभी वह उद्धत बन जाता (3) जब लक्ष्मण को पता चलता है कि राम के अभिषेक में कैक ने टाँग अड़ाई है, तो वे रमार से समो युवतियो को समाप्त कर देने : घोषणा करता है। इस प्रकार उसमे वीरता है, किन्तु अमर्यादित । लक्ष्म की वीरता में सन्तुलन का अभाव है। उसको इस प्रकार उद्धत बनने लिए उसका भ्रातृप्रेम ही बाध्य करता है। (4) लक्ष्मण का धैर्य भयकर से भयंकर विपत्ति मे भी वहिर्नि वस्तुओं की अपेक्षा आन्तरिक निगूढ़ताओं से अधिक मिला हुआ है। तभी त राम के समझाने पर वह कहता है कि आपने मेरा आशय नही समझा आपको राज्य से च्युत किया गया, इस कारण मुझे दुःख नहीं है, किन्तु मे क्रोध का कारण यह है कि आपको 14 वर्ष तक वन मे रहना पडेगा। (5) इस प्रकार समग्र हृदय, आशा और आश्वासन, शक्ति औ सकल्प, प्रेम और प्रार्थना से जीवन और यौवन को कर्त्तव्य की बलि वेदी पर चढाने वाले लक्ष्मण अपने अग्रज राम का परम भक्त है। (5) दशरथ (1) राजा दशरथ एक स्नेही पिता है । सन्तान का स्नेह उनके जीवन का सम्बल है । वृद्धावस्था मे उत्पन्न अपने चारो पुत्रो मे से राम उनको प्राणों से भी अधिक प्रिय है। तभी तो राम के वन चले जाने पर दशरथ पुत्र वियोग में व्याकुल होकर गिरते हैं, उठते है और हाय-हाय की रट लगाते हैं । (2) यही पुत्र वियोग उनके सामने साक्षात् मृत्यु बन कर खडा हो जाता है। राम के अभाव मे उनके प्राण जलहीन मछली की तरह छटपटाते है। इसके सामने दशरथ का सासारिक स्नेह टूटता जाता है। वे अपने कष्ट से घबरा कर कहीं भाग नहीं पाते और दुःख का यह अस्तित्व उनमें एक विचित्र परिवर्तन ला देता है । (3) दशरथ की यह पीड़ा और भी अधिक घनी हो जाती है। वे अपनी प्राणाधिक प्रिय पत्नी कैकेयी के लिए भी सोचते हैं कि यदि वह वन मे