प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
by महाकवि भास
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Read in context( 25 ) ५ प्रतिज्ञा पालक व्याघ्री बन जाती तो अच्छा रहता (2.8)। इस प्रकार राजा दशरथ के चरित्र मे अपूर्व पुत्र प्रेम ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। (4) कौसल्या के यह कहने पर कि 'मै वही अभागिन हूँ" दशरथ तड़प उठते है। वे कहते है- "नही, नही कौसल्ये, तुम धन्य हो । तुमने तो, राम को गर्भ मे धारण किया है। अभागा तो मैं हूँ, जो अग्नि के समान असह्य इस दुःख को न सह सकता हूँ तथा न दूर कर सकता हूँ।" (5) इस प्रकार दशरथ अपने पुत्र वियोग में ही प्राणों को छोड देते है । उनकी मृत्यु मे अन्ध मुनि पुत्र का वध भी कारण माना गया है, जो उन्हें शाप के रूप मे प्राप्त हुआ था। एक पराक्रमी सम्राट का इस प्रकार का अन्त भाग्य की बलवत्ता और प्राणी की असहाय स्थिति को प्रकट करता है । (6) कौसल्या प्रतिमा की कौसल्या त्याग, तपस्या और अनुराग की प्रतिमूर्ति है। वह कैकेयी अथवा भरत से रुष्ट या क्षुब्ध नही होती। वह तो भरत को देखते ही अपने आशीष से उसे स्नान करा देती है—"जात, निस्सन्तापो भव ।" अपनी जननी कैकेयी की अवहेलना करने वाले भरत को भी वह उपदेश देते हुए कहती है कि "तुम तो सदाचार का पालन करने वाले हो, फिर अपनी माँ की वन्दना क्यो नही करते ।" इस नाटक की कौसल्या आदर्श की प्रति- मूर्ति है। उसका पारिवारिक स्नेह अर्थात, पुत्र प्रेम तथा पति प्रेम अपूर्व एवं उच्चकोटि का है। वह कमल से भी कोमल और वज्र से भी कठोर है। कैकेयी के कुचक्र के कारण राम का अभिषेक रुका तथा इसका अप्रिय व कठोर आघात कौसल्या को लगा। पहले तो वह तिलमिला उठती है, पर शीघ्र ही संभल जाती है। इसीलिए तो वह दुःखी और सन्तप्त महाराज दशरथ को अति गम्भीर तथा शान्त भाव से सान्त्वना देती है। वह यद्यपि महाराज से कैकेयी के विरुद्ध पता नही क्या-क्या कहने वाली थी, किन्तु स्वयं दशरथ की दशा देखकर इतना ही कह सकी—"महाराज, धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए।" : इस प्रकार भास द्वारा प्रस्तुत राम जननी कौसल्या सेवा, त्याग, ममता, करुणा, क्षमा आदि नारी हृदय की सभी उदात्त वृत्तियों का प्रतीक है। (7) कैकेयी भास द्वारा प्रस्तुत किया गया कैकेयी का चरित्र सर्वथा नवीन रूप में