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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 103 of 187

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Page 103

प्रत्यभिज्ञाहृदय ६३ समावेशात्मा, 'मुदो'--हर्षस्य वितरणात्, परमानंद स्वरूपत्वात् पाश- द्रावणात्, विश्वस्य अन्तः तुरीयसत्तायां मुद्रणात् च मुद्रात्मा, क्रमः अपि सृष्ट्यादिक्रमाभासकत्वात् तत्क्रमाभासरूपत्वात् च 'क्रम' इति अभिधीयते इति ।। १९ ।। इदानीम् अस्य समाधिलाभस्य फलमाह तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मकपूर्णाहन्तावेशात्सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवताचक्रेश्वरताप्राप्ति र्भवतीति शिवम् ।। २० ।। नित्योदिते समाधौ लब्धे सति, 'प्रकाशानन्दसारा'--चिदा- यह है कि वह नित्य प्रकट समावेश रूपी मुद्राक्रम होता है । इसको मुद्रा निम्न कारणों से कहा है :- (१) परमानन्द स्वरूप होने से, 'मुद' अर्थात् आनन्द के वितरण के कारण (मुदं राति ददाति वितरति इति 'मुद्रा' इस व्युत्पत्ति से) (२) पाश (बन्ध) विलयन के कारण (मुम बन्धं द्रावयति इति मुद्रा-इस व्युत्पत्ति से) । (३) विश्व का भीतरी तुरीया सत्ता में मुद्रित अर्थात् मोहरबन्द होने के कारण (मुद्रयति इति मुद्रा-इस व्युत्पत्ति से) । [यहाँतक तो मुद्राका अर्थ हुआ । अब क्रम का अर्थ बतलाते हैं ।] यह क्रम इसलिए कहलाता है (१) क्योंकि वह सृष्टि इत्यादि (सृष्टि, स्थिति, संहार) के क्रम का प्रदर्शक है । (२) क्योंकि यह स्वयं सृष्टि इत्यादि क्रम में भासित होता है ।।१९।। अब इस समाधिलाभ का फल बतलाते हैं :- सूत्र २०-तब (क्रममुद्रा सिद्धि के अनन्तर) प्रकाश और आनन्द का सार, महामन्त्र वीर्यरूप पूर्ण अहन्ता में समावेश होने से, अपने उस संवित् देवता के समूह पर प्रभुत्व की प्राप्ति होती है जो समूह सारे विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है । यह सब शिव का स्वभाव है । नित्योदित (सदा प्रकट रहनेवाली) समाधि के प्राप्त होने पर जो यह पूर्ण परमोत्कृष्ट विमर्श रूपी अहन्ता¹⁰¹ अर्थात् स्वाभाविक