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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 104 of 187

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Page 104

९४ प्रत्यभिज्ञाहृदय ह्लादैकघना 'महती मन्त्रवीर्यात्मिका' - सर्वमन्त्रजीवितभूता 'पूर्णा' पराभट्टारिकारूपा या इयम् 'अहन्ता' - अकृत्रिमः स्वात्मचमत्कारः, तत्र 'आवेशात्' 'सदा' कालान्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य विश्वस्य यौ 'सर्गसंहारौ' - विचित्रौ सृष्टिप्रलयौ 'तत्कारि' यत् 'निजं संवि- द्वेवताचक्रं' 'तदैश्वर्यस्य' 'प्राप्तिः' - आसादनं 'भवति', प्राकरणिकस्य परमयोगिन इत्यर्थः; 'इति' एतत् सर्वं शिवस्वरूपमेव इति उप- संहारः - इति संगतिः । तत्र यावत् इदं किंचित् संवेद्यते, तस्य संवेदनमेव स्वरूपं ; तस्यापि अन्तर्मुखविमर्शमयाः प्रमातारः तत्त्वम् ; तेषामपि विगलितदेहाद्युपाधिसंकोचाभिमाना अशेषशरीरा सदा- शिवेश्वरतैव सारम् ; अस्या अपि प्रकाशैकसद्भावापादिताशेषविश्व- चमत्कारमयः श्रीमान् महेश्वर एव परमार्थः; - नहि पारमार्थिक- प्रकाशावेशं विना कस्यापि प्रकाशमानता घटते - स च परमेश्वरः स्वातन्त्र्यसारत्वात् आदि-क्षान्तामयीयशब्दराशिपरार्मशमयतवेनैव स्वात्मरूपी चमत्कार या आनन्द है, जो कि प्रकाशानन्द सार है अर्थात् जो सघन चिदानन्द का सार है, जो महामन्त्रवीर्यात्मक है अर्थात् जो सब मंत्रों का जीवन स्वरूप है उसमें समावेश होने से कालाग्नि से १७४ लेकर-अन्तिम कला तक विश्व का जो सर्गसंहार अर्थात् विचित्र सृष्टिप्रलय है उसका करनेवाला जो अपना संविद्देवता समूह १७५ है उस पर ऐश्वर्य या प्रभुत्व की प्राप्ति होती है । यह ऐश्वर्य उस परम योगो को प्राप्त होता है जिसका वर्णन इस प्रसंग में हुआ है ! यही इसका अर्थ है । सूत्र में जो 'इतिशिवम्' है उसका तात्पर्य यह है कि यह सब शिव का स्वरूप ही है। इति उपसंहार का द्योतक है । यही इन शब्दों का सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध में (यह ध्यान रखने की बात है कि) जो कुछ भी संवेद्य है अर्थात् जो कुछ भी प्रमेय है उसका स्वरूप संवेदन अर्थात् प्रमाण है और प्रमाण का भी तात्त्विक स्वरूप अन्तर्मुखी आत्मचेतनापूर्ण प्रमाता है। उन प्रमाताओं की भी सदाशिवेश्वरता सार है जिसमें देह इत्यादि संकुचित अनुबन्धों से तादात्म्य का भाव विगलित हो गया है और जिसका शरीर समस्त विश्व है। उस सदाशिवेश्वरता का भी परम सार महेश्वर है जो उस समस्त विश्व के चमत्कार १७६ से परिपूर्ण है जो कि प्रकाश के साथ एक सद्भाव १७७ (एक होने के भाव) से घटित होता है। पारमार्थिक प्रकाश के संचार के बिना कोई भी वस्तु प्रकाश (अभिव्यक्ति) में आही नहीं सकती।