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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 105 of 187

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Page 105

प्रत्यभिज्ञाहृदय ६५ एतत्स्वीकृतसमस्तवाच्य-वाचकमयाशेषजगदानन्दसद्भावापादनात् परं परिपूर्णत्वात् सर्वाकाङ्क्षाशून्यतया आनन्दप्रसरनिर्भरः; अत एव अनुत्तराकुलस्वरूपात् अकारात् आरभ्य शक्तिस्फाररूपहकलापर्यन्तं यत् विश्वं प्रसृतं, क्षकारस्य प्रसरशमनरूपत्वात्; तत् अकार-हकारा- भ्यामेव संपुटीकारयुक्त्या प्रत्याहारन्यायेन अन्तः स्वीकृतं सत् अवि- भागवेदनात्मकबिन्दुरूपतया स्फुरितम् अनुत्तर एव विश्राम्यति;--इति शब्दराशिस্বরূপ एव अयम् अकृतको विमर्शः । यथोक्तं 'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहं-भावो हि कीर्तितः । उक्ता च सैव विश्रान्तिःसर्वापेक्षानिरोधतः ॥ स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' वह परमेश्वर आनन्द के प्रसार से भरा हुआ है क्योंकि वह स्वातंत्र्य का सार है क्योंकि 'अ' से लेकर 'क्ष' तक अमायीय शब्द-राशि की स्मृति के कारण १७८ अपनाये हुए समस्त वाच्यवाचकमय सम्पूर्ण जगत् रूपी आनन्द १७९ के ऐक्यभाव से सम्पन्न होने से वह सर्वथा परिपूर्ण है और सब आकांक्षाओं से रहित है। इसलिए अ से लेकर जो अनुत्तर (परम) अकुल १८० का स्वरूप है, शक्ति के प्राचुर्य और फैलाव स्वरूप 'ह' कला तक जो विश्व फैला हुआ है-क्ष तो फैलाव की समाप्ति का द्योतक मात्र हैं-वह विश्व 'अ' और 'ह' के संयोजन द्वारा प्रत्याहार १८१ की तरह भीतर स्वीकार किया हुआ अविभाग (एकाकार) का द्योतक बिन्दु १८२ के रूप में फड़कता हुआ 'अनुत्तर' में (अर्थात् जिससे परे और कुछ नहीं है, परम शिव में) ही ठहरा हुआ है। इस प्रकार यह स्वाभा- विक विमर्श (अहं की आन्तरिक अनुभूति) शब्दपुञ्ज रूप ही है। जैसा कि कहा गया है (दे० उत्पलदेव की अजडप्रमातृसिद्धि श्लो० २२, २३) । “सभी वेद्य रूपी प्रकाश १८३ की अपने भीतर विश्रान्ति 'अहंभाव' (आत्म- प्रतीति) कहलाता है। इसी विश्रान्ति को समस्त अपेक्षाओं के निरसन होने पर स्वातंत्र्य, मुख्य कर्तृत्व और ईश्वरता कहते हैं।” यही अहन्ता महती शक्तिभूमि है (सब शक्तियों का महान् आधार) है, क्योंकि यही सभी मंत्रों के उदय और विश्रान्ति का स्थान हैं, क्योंकि इसी के बल से वे सारी क्रियाएँ होती हैं जिनसे किसी उद्देश्य की सिद्धि होती है।

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