प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context६६ प्रत्यभिज्ञाहृदय इति। एषैव च अहन्ता सर्वमन्त्राणाम् उदयविश्रान्तिस्थानत्वात् एतद्बलेनैव च तत्तदर्थक्रियाकारित्वात् महती वीर्यभूमिः। तदुक्तम् 'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा... ...।' इत्यादि .... त एते शिवधर्मिणः ॥' इत्यन्तम् श्रीस्पन्दे। शिवसूत्रेषु अपि 'महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः, (१उ० २२ सू०) इति। तदत्र महामन्त्रवीर्यात्मिकायां पूर्णाहन्तायाम् 'आवेशो'--देह- प्राणादिनिमज्जनात् तत्पदावाप्त्यवष्टम्भेन देहादीनां नीलादीनामपि तद्रसाप्लावनेन तन्मयीकरणम्। तथा हि--देहसुखनीलादि यत् किंचित् प्रथते, अध्यवसीयते, स्मर्यते, संकल्प्यते वा, तत्र सर्वत्रैव भगवती चितिशक्तिमयी प्रथा भित्तिभूतैव स्फुरति;--तदस्फुरणे कस्यापि अस्फु- श्री स्पन्दकारिका में कहा गया है (स्प० का० द्वि० नि० १, १) “इसी बल को पहुँच कर" यहाँ से लेकर वे “सब शिवात्मक हैं" यहाँ तक। शिव सूत्र में भी कहा गया है :- “यही वह महासरोवर१८४ है जिससे सम्बन्ध स्थापित करने१८५ से मंत्रशक्ति का अनुभव होता है।" (१ उ०, २२ सूत्र) [यहाँ तक सूत्र के “प्रकाशानन्दसार” अंश पर भाष्य है। अब “महामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्ता- वेशात्” इ० अंश पर भाष्य प्रारम्भ होता है]। यहाँ पर (इस सूत्र में) महामन्त्रशक्तिरूपी पूर्ण अहन्ता में आवेश कहने का तात्पर्य है 'देहप्राण इत्यादि के उसमें निमज्जन से अर्थात् उस पद की प्राप्ति की स्थिरता से देह, नील इत्यादि वेद्यों (ज्ञेयों) को उसके (पूर्ण अहन्ता के) रस में निमग्न कर तन्मय कर देना।' देह, सुख नील इत्यादि जो कुछ प्रकाश में आ रहा है, अथवा जो कुछ (बुद्धि के द्वारा) निश्चय किया जा रहा है, (मन के द्वारा) स्मरण किया जा रहा है अथवा संकल्प किया जा रहा है—इस सत्र में भगवती चितिशक्ति का प्रकाश पृष्ठभूमि होकर स्फुरण करता रहता है। यह ठीक ही कहा गया है कि बिना उसके (चितिशक्ति के) स्फुरण के कुछ भी प्रकाश में