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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

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Page 114

१०४ प्रत्यभिज्ञाहृदय (ङ) अनुग्रह—स्वरूप का प्रकाश : ये पांचों कृत्य शिव में स्वभावतः सदा होते रहते हैं । शिव अपने भीतर से जगत् को बहिर्मुख करता है (सृष्टि) उसे कुछ काल के लिए स्थित रखता है (स्थिति), पुनः उसे अपने में समेट लेता है (संहार) । इन तीनों को मिलाकर कल्प कहते हैं । यह सदा चलता रहता है । एक कल्प के अनन्तर दूसरा प्रारम्भ होता है । ये तीनों कृत्य 'क्षेत्र' की दृष्टि से होते रहते हैं । तिरोभाव और आविर्भाव, निग्रह और अनुग्रह 'क्षेत्रज्ञ' की दृष्टि से होते रहते हैं । वस्तुतः अनुग्रह या स्वरूप के पुनः प्रकाशन के लिए ही पूर्व के चारों कृत्य होते रहते हैं । शिव अपने स्वातन्त्र्य से अपना गोपन करके जगत् में संसरण करता है और पुनः अपना प्रकाशन करके अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होता है । जीव जब स्वदेश (शिव-स्थिति) से कुछ काल के लिए वियुक्त होकर विदेश (संसार) में भ्रमण करके (प्रवृत्ति) पुनः स्वदेश में लौटता है (निवृत्ति) तब वह स्वदेश के मूल्य को और अच्छी तरह से समझता है । अतः यह संसरण, यह प्रवृत्ति- निवृत्ति का चक्र निरर्थक नहीं है । ५. चिदानन्दधन—जो चित् और आनन्द का समूह है । इस शास्त्र में सच्चिदानन्द का बहुत कम प्रयोग मिलता है । चिदानन्द का ही अधिक प्रयोग मिलता है । कारण यह है कि अभिव्यक्ति को लेकर ही कुछ कह सुन सकते हैं । चित् और आनन्द यही सत् की मुख्य अभिव्यक्ति है । अत एव अभिव्यक्ति की दृष्टि से चिदानन्द का ही प्रयोग हुआ है। दूसरे सत् का स्वरूप ही चित् और आनन्द है । अतः उसे अलग से कहने की आवश्यकता नहीं । ६. 'स्वात्म' शब्द के दो भाव हैं (१) अपना स्वरूप (२) स्वकीय आत्मा । पहले भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधनस्वात्म-परमार्थविभासिने' का अर्थ है जो परमार्थ को अवभासित करता रहता है जिसका स्वात्म या स्वरूप चिदा- नन्दधन है । दूसरे भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधन स्वात्मपरमार्थविभासिने' का अर्थ है' जो स्वकीय आत्मा (स्वात्म) को जो कि परमार्थ है और चिदा- नन्दधन है अवभासित करता रहता है । इस शास्त्र की दृष्टि से दूसरा अर्थ अधिक अच्छा है । ७. परमार्थ—परम-सर्वोच्च, सर्वोत्तम । अर्थ शब्द के दो अर्थ हैं (१) वस्तु और (२) इष्ट या लक्ष्य । परमार्थ से यह ध्वनित होता है कि जो परम सत्ता या वस्तु है वही जीवन का परम लक्ष्य या इष्ट भी है ।

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