प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextटिप्पणियाँ १०३ जीवों का उद्धार करता है। वह तात्त्विक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सबका मूल है। भोग भी उसी से होता है, और मोक्ष भी उसी से होता है। प्रत्यभिज्ञा, त्रिक और स्पन्द शास्त्र के अतिरिक्त इसका नाम 'शैवदर्शन' या 'भैरवदर्शन' भी है। इसका शैव या भैरवदर्शन इसलिए नाम पड़ा क्योंकि यह शिव या भैरव को ही सारी सत्ता का मूल मानता है। यह अद्वैत दर्शन है। दक्षिण के शैवदर्शन से (जो कि द्वैत हैं) पृथक् करनेके लिए इसे कश्मीर का शैवदर्शन भी कहते हैं। ३. सततम् - 'सततम्' का अन्वय 'नमः' अथवा 'पञ्चकृत्यविधायिने', दोनोंके साथ हो सकता है। सततम् नमः का अर्थ होगा शिवको मेरा बराबर नमस्कार है। सततम् पञ्चकृत्यविधायिने का अर्थ होगा जो नित्य (बराबर) पञ्चकृत्य का करनेवाला है उसे (मेरा नमस्कार है)। दूसरा अन्वय अधिक समीचीन है और इस शास्त्र की मूल दृष्टि से मिलता है। ४. पञ्चकृत्य--पाँच कार्य जो शिव सदा करता है निम्नलिखित हैं:- (क) सृष्टि : यह शब्द सृज् धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है 'अपने में से बाहर कर देना, छोड़ना, फेंकना, निकालना'। यह बहुत ही व्यंजक शब्द है। इसके भीतर एक तात्त्विक दृष्टि निहित है। सृष्टि का भाव यह है कि शिव के भीतर सब कुछ है, वह केवल उसे बाहर फेंक देता है। सृष्टि शिव का वैभव है जिसे वह बिखेर देता है। इससे यह भी ध्वनित होता है कि- शिव जगत् का उपादान और निमित्त कारण दोनों है। वह एक कुम्भकार के समान नहीं है जो कि यदि बाहर से मिट्टी मिलती है, तब ही पात्र बना सकता है। उसकी शक्ति ही जगत्-रूप में प्रकट होती है। (ख) स्थिति : सृष्टि के अनन्तर जगत् का ठहराव और पालन। (ग) संहार अथवा संहृति : इसका अर्थ है समेट लेना, बटोर लेना। जिसका सर्जन किया था, जिसको बाहर फेंका था उसको पुनः समेट लेना। संहार का अर्थ विनाश नहीं है। जो वस्तु व्यक्त थी वह जब अव्यक्त हो जाती है तब ऐसा लगता है कि उसका विनाश हो गया। अतः गौण रूप से उसे लोग विनाश कह लेते हैं, किन्तु यह संहार का वास्तविक अर्थ नहीं है। (घ) विलय, विधान, तिरोधान अथवा निग्रह-अपने सच्चे स्वरूप का आवरण या गोपन कर देना।