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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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टिप्पणियाँ १०३ जीवों का उद्धार करता है। वह तात्त्विक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सबका मूल है। भोग भी उसी से होता है, और मोक्ष भी उसी से होता है। प्रत्यभिज्ञा, त्रिक और स्पन्द शास्त्र के अतिरिक्त इसका नाम 'शैवदर्शन' या 'भैरवदर्शन' भी है। इसका शैव या भैरवदर्शन इसलिए नाम पड़ा क्योंकि यह शिव या भैरव को ही सारी सत्ता का मूल मानता है। यह अद्वैत दर्शन है। दक्षिण के शैवदर्शन से (जो कि द्वैत हैं) पृथक् करनेके लिए इसे कश्मीर का शैवदर्शन भी कहते हैं। ३. सततम् - 'सततम्' का अन्वय 'नमः' अथवा 'पञ्चकृत्यविधायिने', दोनोंके साथ हो सकता है। सततम् नमः का अर्थ होगा शिवको मेरा बराबर नमस्कार है। सततम् पञ्चकृत्यविधायिने का अर्थ होगा जो नित्य (बराबर) पञ्चकृत्य का करनेवाला है उसे (मेरा नमस्कार है)। दूसरा अन्वय अधिक समीचीन है और इस शास्त्र की मूल दृष्टि से मिलता है। ४. पञ्चकृत्य--पाँच कार्य जो शिव सदा करता है निम्नलिखित हैं:- (क) सृष्टि : यह शब्द सृज् धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है 'अपने में से बाहर कर देना, छोड़ना, फेंकना, निकालना'। यह बहुत ही व्यंजक शब्द है। इसके भीतर एक तात्त्विक दृष्टि निहित है। सृष्टि का भाव यह है कि शिव के भीतर सब कुछ है, वह केवल उसे बाहर फेंक देता है। सृष्टि शिव का वैभव है जिसे वह बिखेर देता है। इससे यह भी ध्वनित होता है कि- शिव जगत् का उपादान और निमित्त कारण दोनों है। वह एक कुम्भकार के समान नहीं है जो कि यदि बाहर से मिट्टी मिलती है, तब ही पात्र बना सकता है। उसकी शक्ति ही जगत्-रूप में प्रकट होती है। (ख) स्थिति : सृष्टि के अनन्तर जगत् का ठहराव और पालन। (ग) संहार अथवा संहृति : इसका अर्थ है समेट लेना, बटोर लेना। जिसका सर्जन किया था, जिसको बाहर फेंका था उसको पुनः समेट लेना। संहार का अर्थ विनाश नहीं है। जो वस्तु व्यक्त थी वह जब अव्यक्त हो जाती है तब ऐसा लगता है कि उसका विनाश हो गया। अतः गौण रूप से उसे लोग विनाश कह लेते हैं, किन्तु यह संहार का वास्तविक अर्थ नहीं है। (घ) विलय, विधान, तिरोधान अथवा निग्रह-अपने सच्चे स्वरूप का आवरण या गोपन कर देना।

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१०४ प्रत्यभिज्ञाहृदय (ङ) अनुग्रह—स्वरूप का प्रकाश : ये पांचों कृत्य शिव में स्वभावतः सदा होते रहते हैं । शिव अपने भीतर से जगत् को बहिर्मुख करता है (सृष्टि) उसे कुछ काल के लिए स्थित रखता है (स्थिति), पुनः उसे अपने में समेट लेता है (संहार) । इन तीनों को मिलाकर कल्प कहते हैं । यह सदा चलता रहता है । एक कल्प के अनन्तर दूसरा प्रारम्भ होता है । ये तीनों कृत्य 'क्षेत्र' की दृष्टि से होते रहते हैं । तिरोभाव और आविर्भाव, निग्रह और अनुग्रह 'क्षेत्रज्ञ' की दृष्टि से होते रहते हैं । वस्तुतः अनुग्रह या स्वरूप के पुनः प्रकाशन के लिए ही पूर्व के चारों कृत्य होते रहते हैं । शिव अपने स्वातन्त्र्य से अपना गोपन करके जगत् में संसरण करता है और पुनः अपना प्रकाशन करके अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होता है । जीव जब स्वदेश (शिव-स्थिति) से कुछ काल के लिए वियुक्त होकर विदेश (संसार) में भ्रमण करके (प्रवृत्ति) पुनः स्वदेश में लौटता है (निवृत्ति) तब वह स्वदेश के मूल्य को और अच्छी तरह से समझता है । अतः यह संसरण, यह प्रवृत्ति- निवृत्ति का चक्र निरर्थक नहीं है । ५. चिदानन्दधन—जो चित् और आनन्द का समूह है । इस शास्त्र में सच्चिदानन्द का बहुत कम प्रयोग मिलता है । चिदानन्द का ही अधिक प्रयोग मिलता है । कारण यह है कि अभिव्यक्ति को लेकर ही कुछ कह सुन सकते हैं । चित् और आनन्द यही सत् की मुख्य अभिव्यक्ति है । अत एव अभिव्यक्ति की दृष्टि से चिदानन्द का ही प्रयोग हुआ है। दूसरे सत् का स्वरूप ही चित् और आनन्द है । अतः उसे अलग से कहने की आवश्यकता नहीं । ६. 'स्वात्म' शब्द के दो भाव हैं (१) अपना स्वरूप (२) स्वकीय आत्मा । पहले भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधनस्वात्म-परमार्थविभासिने' का अर्थ है जो परमार्थ को अवभासित करता रहता है जिसका स्वात्म या स्वरूप चिदा- नन्दधन है । दूसरे भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधन स्वात्मपरमार्थविभासिने' का अर्थ है' जो स्वकीय आत्मा (स्वात्म) को जो कि परमार्थ है और चिदा- नन्दधन है अवभासित करता रहता है । इस शास्त्र की दृष्टि से दूसरा अर्थ अधिक अच्छा है । ७. परमार्थ—परम-सर्वोच्च, सर्वोत्तम । अर्थ शब्द के दो अर्थ हैं (१) वस्तु और (२) इष्ट या लक्ष्य । परमार्थ से यह ध्वनित होता है कि जो परम सत्ता या वस्तु है वही जीवन का परम लक्ष्य या इष्ट भी है ।

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टिप्पणियां १०५ ८. 'शाङ्कर'—शं करोति इति शंकरः जो कल्याण करता है वह 'शंकर' है। यह शिव का दूसरा नाम है। 'शाङ्करोपनिषद्' का अर्थ है शिव सम्बन्धी रहस्यशास्त्र अर्थात् शैवदर्शन । ६. उपनिषद्—उप + नि + सद्—इसका शाब्दिक अर्थ है (आचार्य के) पास अच्छी तरह बैठना । अर्थात् इस प्रकार बैठकर रहस्य-ज्ञान की प्राप्ति । शांकरोपनिषद् का अर्थ है शंकर सम्बन्धी रहस्यज्ञान । श्री शंकराचार्य ने उपनिषद का अर्थ आत्मज्ञान द्वारा अविद्या का नाश भी किया है, किन्तु यहाँ इसका अर्थ रहस्य या रहस्यज्ञान ही है। १०. संसार—संसरति इति संसारः । जो स्थिर न हो, जो सदा सरकता रहे, चलता रहे उसे संसार कहते हैं। संसार का अर्थ जीव का एक योनि या अवस्था से दूसरो योनि या अवस्था में संसरण या भ्रमण करते रहना भी है। यहाँ संसार शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। संसार जगत् रूप में विष नहीं है, जाव के भ्रमण रूप में ही विष है। विष शब्द जुहोत्यादिगण के 'विष्लृ' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्याप्त होना । शरीर में व्याप्त होकर घातक होने के कारण इसे 'विष' कहते हैं। ऋचादिगण में भी एक विष धातु है जिसका अर्थ है विप्रयोग या वियोग करना । संसार इस लिए भी विष है कि वह हमको शिव से वियुक्त कर देता है । ११. तर्कशास्त्र—हेतुपूर्णयुक्त और विवेचना के नियम को बतलाने वाला शास्त्र । १२. समावेश—यह सम् + आ + विश् से बना है जिसका अर्थ है अच्छे प्रकार से प्रवेश । पारमेश्वर समावेश का अर्थ है परमेश्वर के साथ जीव का एकात्मभाव जिसमें वह अपने को शिव से अभिन्न समझता है । समावेश का अर्थ शिव का जीव में प्रवेश कर उस पर छा जाना भी होता है। चाहे हम शिव का जीव में प्रवेश या जीव का शिव में प्रवेश जो भी अर्थ लें दोनों का परिणाम एक ही है जीव का शिव से एकात्मभाव । १३. शक्तिपात—शक्ति शिव का क्रियात्मक बल है। अतः वह शिव से अभिन्न है। शक्ति से ही शिव पंचकृत्य करता है। शक्तिपात का अर्थ है शक्ति का किसी पर गिरना अर्थात् शिव का अनुग्रह, शिष्य या साधक में गुरु द्वारा या शिव द्वारा आत्मिक बल का उन्मेष ।

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१०६ प्रत्यभिज्ञाहृदय १४. सूत्र—सूत, तागा, जो सूत के समान कुछ विचारों को एक साथ ग्रथित किये रहता है। थोड़े से अक्षरों में कहा हुआ वचन जो बहुत अर्थ व्यक्त करे 'सूत्र' कहलाता है। यहाँ सूत्र एक पारिभाषिक शब्द है। सूत्र का लक्षण इस प्रकार कहा गया है—'स्वल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रविदो विदुः' अर्थात् सूत्र के जानकार (उसको) सूत्र मानते हैं जिसमें कम अक्षर हों, जिसमें (अर्थ के विषय में) कोई सन्देह न हो, जो सारपूर्ण हो, जो सर्वत्र लागू हो, जिसमें व्यर्थ के शब्द न हों और जो निर्दोष हो । १५. स्वतंत्रा--यह चिति का विशेषण है। 'स्वतंत्रा' का अर्थ है जो स्व अर्थात् अपने ही ऊपर अवलम्बित है, किसी दूसरे से सहायता नहीं लेती, जो सब बन्धनों से मुक्त है और जो सब कुछ सम्पादन करने में समर्थ है। १६. चिति समष्टि वित् को कहते हैं। यह परासंवित् अर्थात् सर्वोत्कृष्ट संवित् या शिव की शक्ति है। चिति समष्टि संवित् है। चित्त व्यष्टि संवित् है। चित् शब्द प्रायः शिव के लिए प्रयुक्त होता है और चिति उसकी शक्ति के लिए। १७. 'सिद्धि' शब्द के कई अर्थ हैं जो कि इस सूत्र के भाष्य में बतलाये गए हैं। मुख्यतः इसका अर्थ है सम्पादन अर्थात् काम का पूरा होना विश्व की सिद्धि में विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार सभी अन्तर्भूत हैं। १८. सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य—सदाशिव से लेकर पृथिवी तक। इस दर्शन के अनुसार ३६ तत्व हैं। ये दो भागों में बाँटे जा सकते हैं (१) शुद्ध अध्वा और (२) अशुद्ध अध्वा। अध्वा का अर्थ है रास्ता, मार्ग, पद्धति, प्रकार, क्रम, काल। शिव की अभिव्यक्ति का मार्ग या पद्धति जो माया से ऊपर है, जहाँ तक वेदक और वेद्य में भेद नहीं है वहाँ तक शुद्ध अध्वा कहलाता है। जहाँ से भेद प्रारम्भ होता है वहाँ से लेकर भूमि तक अशुद्ध अध्वा कहलाता है। शिव से लेकर अवरोही क्रम में ३६ तत्त्व इस प्रकार हैं। १. शिवः—यह सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है। यह समष्टि चित् है। चित् ही इसका स्वरूप है। २. शक्तिः—शिव का अभिन्न चिन्मय सामर्थ्य या स्वातंत्र्य। इसमें आनन्द का प्राधान्य है। ये दोनों तत्त्व सभी अभिव्यक्ति के मूल हैं और एक प्रकार से अभिव्यक्ति से परे हैं।

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टिप्पणियाँ १०७ शुद्ध अध्वा अथवा अतिजागतिक अभिव्यक्ति ३. सदाशिवः-- इस तत्त्व में अहन्ता और इच्छा का प्राधान्य रहता है। इदन्ता या विश्व अभी अस्फुट अवस्था में है। इसका दूसरा नाम सादाख्य तत्त्व भी है। इसका परामर्श है 'अहमिदम्' मैं यह (विश्व) हूं। इस अवस्था में 'मैं' और 'विश्व' में कोई भेद नहीं है। अभी विश्व स्फुट हुआ ही नहीं है। सादाख्य का अर्थ है 'सत् आख्या यतः'–वह अवस्था जहाँ सबसे पहले सत्ता का भान होता है। ४ ईश्वर :-इस तत्त्व में अहन्ता और इदन्ता, अहं का ज्ञान और विश्व का आभास दोनों समान रूप से एक साथ ही स्फुट रहता है। इसमें ज्ञान का प्राधान्य है। इसी से प्रनेय, या ज्ञेय स्फुट रहता है। इसका परामर्श है 'इदमहम्'–यह (विश्व) मैं हू । विश्व प्रमेय या वेद्य रूप में रहता है। किन्तु 'अहम्' या 'मैं' से उसका अभेद रहता है। ५. विद्या या शुद्धविद्या या सद्विद्याः--इसमें क्रिया का प्राधान्य है। इसका परामर्श है 'अहमिदं च अथवा इदं च अहं च'। अर्थात् मैं, मैं हूँ और यह (विश्व) भी हू । यह भेदाभेद की अवस्था है अर्थात् भेद होने पर भी उसमें अभेद का बोध बना रहता है। यद्यपि विश्व वेद्य या ज्ञेय रूप में भान होता है, तथापि यह ज्ञान बना रहता है कि यह विश्व मैं ही हूँ। यह मेरा ही रूप है, मुझ से भिन्न नहीं है। इसी से इसे शुद्ध विद्या कहते हैं, क्योंकि अभी विश्व का अपने से भेद नहीं है। शिव से शुद्धविद्या तक पाँच तत्त्व शुद्ध अध्वा कहलाते हैं। क्योंकि अभी तक वेदक और वेद्य, प्रमाता और प्रमेय या ज्ञाता और ज्ञेय एकात्मक हैं अर्थात् अभी तक वेद्य या ज्ञेय अपना ही रूप है और अभी तक पूर्ण रूपेण स्वरूपगोपन नहीं हुआ है। ये पाँचों तत्त्व चित् की सर्वगत अवस्था को व्यक्त करते हैं। यहाँ तक वेद्य वेदक से भिन्न नहीं है; वेदक का वेद्य से अभेद बना हुआ है। अशुद्ध अध्वा अथवा जागतिक अभिव्यक्ति ६. माया-विश्व निर्माणकारी या 'परिमितिकारीतत्त्व' । कभी-कभी यह तत्त्व कंचुकों में सम्मिलित नहीं किया जाता, क्योंकि इसी से कंचुकों का प्रादुर्भाव होता है। माया स्वरूप का गोपन कर देती है और भेद और नानात्व की जननी है।

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१०८ प्रत्यभिज्ञाहृदय माया के पंच कंचुक (खोल) ७. कला—कर्तृत्व या साधकता का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व । ८. विद्या—ज्ञातृत्व का संकोच अथवा ज्ञान का परिच्छिन्नत्व । ९. राग—तृप्ति का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व जिसके कारण सदा भिन्न भिन्न विषयों की चाह बनी रहती है । १०, काल—नित्यता का संकोच जिसके कारण भूत (अतीत), भवत् (वर्तमान) और भविष्यत् का अलग अलग बोध होता रहता है और जन्म-मरण होता रहता है । ११. नियति—स्वातंत्र्य का संकोच जिसके कारण परिच्छिन्न देश कारण इत्यादि का बोध होता है। नियति ही जीवको कृत्य और अकृत्य में अवश बनाकर उसका नियमन करती रहती है । १२. पुरुष—जब शिव अपनी माया द्वारा आत्मगोपन करके परिमित या परिच्छिन्न प्रमाता बन जाता है, तब उसको पुरुष कहते हैं । प्रमाता वा पुरुष हो जाने पर शिव का सर्वकर्तृत्व कला में अर्थात् किंचित्- कर्तृत्व में परिणत हो जाता है, उसका सर्वज्ञत्व विद्या (परिच्छिन्न ज्ञान) में परिणत हो जाता है; उसका पूर्णत्व राग (भिन्न भिन्न विषय के लिए अभिलाषों) में परिणत हो जाता है; उसका नित्यत्व काल (खण्ड खण्ड समय) में परिणत हो जाता है; उसका व्यापकत्व नियति (परिच्छिन्न देश, कारण इत्यादि) में परिणत हो जाता है । कला से नियति तक माया के पांच कंचुक कहलाते हैं जो कि वे अवगुण्ठन या परदे हैं जिनसे शिव अपने को ढक लेता है । १३. प्रकृतिः—बुद्धि से लेकर पृथिवी तक के प्रादुर्भाव की मूल योनि, प्रमेय का मूल अधिष्ठान । इस दर्शन में प्रत्येक पुरुष के लिए भिन्न भिन्न प्रकृति है । १४. बुद्धि—निश्चयात्मक ज्ञान की शक्ति । १५. अहंकार—अहं + कार अहम् (मैं) भाव को 'कार' करनेवाला या प्रकट करनेवाला तत्त्व । १६. मनस् (मन) संकल्प विकल्प चित्त । १७-२१. पंच ज्ञानेन्द्रिय—पांच प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करनेवाली इन्द्रियां ( श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसन, गन्ध ) । २२-२६. पंच कर्मेन्द्रिया (वचन, ग्रहण, गमन, उत्सर्ग और जनन) ।

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२७-३१. पंच तन्मात्र जी कि पांच ज्ञानेन्द्रियों की मूल योनि है— १-शब्द तन्मात्र, २-स्पर्श तन्मात्र, ३-रूपतन्मात्र । ४-रस-तन्मात्र, और ५-गन्धतन्मात्र । ३२-३६. पंच महाभूत—आकाश, वायु, अग्नि, आपः (जल) और भूमि या पृथ्वी । १६. परप्रमाता—सर्वोच्च ज्ञाता । प्रमाता का अर्थ है प्र + माता = प्रकृष्ट रूप से—बहुत ही अच्छी तरह माप लेनेवाला अर्थात् जाननेवाला । परमशिव को पर प्रमाता कहते हैं । २०. पराशक्ति—सर्वोच्च शक्ति, मुख्यशक्ति । इसको परा (सर्वोच्च) इसलिए कहते हैं क्योंकि इसकी सहकारी या गौणशक्तियाँ जगत् में व्याप्त होकर भिन्न भिन्न कार्य सम्पन्न करती हैं। शक्ति का अर्थ है शिव की चेतना या शिव चेतना का स्पन्द जो कि शिव से अभिन्न है। शिव की ही अन्तः स्थित अर्थतत्व को बाहर प्रकट करने की उन्मुखता और क्रियाशील अनुग्रह को शक्ति कहते हैं । २१. विमर्श—वि + मृश् । मृश् धातु का अर्थ है स्पर्श करना । मनसे स्पर्श करना । यह इस दर्शन का एक उच्चकोटि का पारिभाषिक शब्द है। परमशिव प्रकाशमात्र नहीं है, उसे अपने चैतन्य की भी चेतना है। विमर्श परम सत् की शुद्ध आत्मचेतनता है। इसी विमर्श या आत्मचेतनता के द्वारा ही सृष्टि, स्थिति और संहार होता रहता है। इस विमर्श की तीन अवस्थाएं होती हैं। बाह्य रूप में अर्थात् विश्व में प्रकट होना (सृष्टि) इस प्रथन या प्रकटन को कायम रखना (स्थिति) और पुनः अपने आप में वापिस आना (संहार) । इन तीनों अवस्थाओं के द्वारा सहज अहम् (मैं या आत्मा) का विस्फुरण होता रहता है। द्रष्टव्य- "इह खलु परमेश्वरः प्रकाशात्मा । प्रकाशश्चविमर्शस्वभावः । विमर्शो नाम-विश्वाकारेण, विश्वप्रकाशनेन, विश्वसंहरणेन अकृत्रिमाहमिति विस्फुरणम्" (पराप्रावेशिकाः पृ० १-२ कश्मीरसंस्कृत ग्रंथ माला ।) परमशिव में समस्त विश्व उसी प्रकार विद्यमान रहता है जिस प्रकार मयूर (मोर) के अण्डे के रस में चित्र-विचित्र पिच्छकलाप (परों का समूह) विद्यमान रहता है। ( मयूराण्डरसन्यायेन ) । विमर्श आत्मचेतना का ही उपन्यास (बाहर प्रस्तुत करना) है, जिससे आत्मचेतना की बाह्याभिव्यक्ति होती है ।

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११४ प्रत्यभिज्ञाहृदय २२. शिवभट्टारक—भट्टारक, भट्टार और भट्ट शब्द समानार्थक हैं। यह भट्ट शब्द भट् धातु में तन् प्रत्यय लगाकर बना है। भट् धातु भ्वादिगणीय है। इसका अर्थ है पोषण करना (भट् = भृतौ)। भट्ट का अर्थ है पोषणकरनेवाला, भर्ता, स्वामी। इसका प्रयोग राजाओं, ब्राह्मणों और विद्वानों के लिए आदरप्रदर्शनार्थ होता है। भट्टार—(भट्टं = स्वामित्वं ऋच्छति इति, ऋ-अण)। भट्टार वह है जो स्वामित्व को प्राप्त हो अर्थात् जो स्वामी हो। भट्टारक में भट्टार के ही अर्थ में 'क' प्रत्यय लगा है। भट्ट, भट्टार और भट्टारक तीनों एक ही अर्थ के द्योतक हैं। भट्टारक का अर्थ है पूज्यस्वामी। यह शिव के साथ आदरप्रदर्शन के लिए लगाया गया है। २३. नित्योदित—उदित-उत् + इ + क्त से बना हुआ है। इसका शाब्दिक अर्थ है 'ऊपर गया हुआ', 'उठा हुआ', 'उगा हुआ'। नित्योदित का अर्थ है जिसका नित्यउदय है। संसार में जिसका उदय होता है उसका अस्त भी होता है। इस प्रकार की उदित वस्तु को शान्तोदित कहते हैं। किन्तु जिसका सदा उदय है कभी अस्त होता ही नहीं, वह 'नित्योदित' है। चिति चित्-शक्ति है. वह वह मूल चेतना है, जिसका कभी अस्त नहीं होता। चिति केलिए केवल नित्य न कहकर नित्योदित (नित्य उगी हुई) कहने का तात्पर्य यह भी हैं कि वह सदा क्रियाशीला है, उसमें सदा स्पन्द वर्तमान है। २४. प्रमातृ—प्रमाता-विषयों का (चित्त द्वारा) माप कर लेनेवाला ज्ञाता। २५—प्रमाण—माप अथवा ज्ञान और प्रमाण या ज्ञान का करण या साधन। २६. प्रमेय—जो (चित्त द्वारा) माप लिया जाय; ज्ञेय; विषय। विश्वको प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेय-मय कहने का भाव यही है कि समस्त विश्व इन्हीं तीनों का पुञ्ज है। इसमें जो, विषय हैं वे प्रमेय या ज्ञेय हैं, इनको जाननेवाले प्रमाता या जीव हैं और जाननेवालों का, प्रमाण (ज्ञान) और उसका साधन है। इनके अतिरिक्त विश्व और कुछ नहीं है। २७. बैन्दवीकला—पर प्रमाता। वेत्तीति 'विन्दुः'। बिन्दुः विद् धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है 'जानना'। विन्दु अथवा बिन्दु का अर्थ है प्रमाता, ज्ञाता, वेदक। जो परम प्रमाता या संविद् है उसे विन्दु या बिन्दु कहते हैं। 'बिन्दोरियमिति बैन्दवी'। 'बैन्दवी' का अर्थ हुआ विन्दुसम्बन्धी 'कला' का अर्थ यहाँ शक्ति है। 'बैन्दवी कला' का अर्थ हुआ 'आत्मसंवित्ति' (आत्मा की जानने) की शक्ति। यहाँ पर इस

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टिप्पणियाँ १११ इसका अर्थ है आत्मा की वह शक्ति जिससे वह सदा अपने को वेदक के ही रूप में जानता है। यहाँ पर सिर की उपमा आत्मा वा प्रमाता से दी गई है, और पैर की उपमा प्रमाण से। जैसे अपने पैर से कोई अपने सिर की छाया को नहीं लांघ सकता, वैसे ही प्रमाण प्रमाता को मापने या जानने में असमर्थ है। स्वयं प्रमाण का अस्तित्व और सिद्धि प्रमाता के द्वारा है, तो प्रमाण बेचारा प्रमाता के अस्तित्व को क्या सिद्ध करेगा। जिस प्रकार सिर की छाया पैर द्वारा नहीं पकड़ में आ सकती, उसी प्रकार प्रमाता प्रमाण की पकड़ में नहीं आ सकता। २८. सामरस्य—समरस अर्थात् एकरस का भाव। चित्शक्ति ही स्वतंत्ररूप से अर्थात् बिना किसी अन्य की अपेक्षा किये हुए परप्रमाता परम शिव से विश्व की सृष्टि द्वारा पृथक्त्व जैसी अवस्था निष्पन्न करती है, उस अवस्था को कुछ काल तक स्थित रखती है और फिर संहार कर लेती है अर्थात् विश्व को समेट कर उसी अद्वय परमशिव में समरस अर्थात् एकरूप कर देती है। २९. स्वतन्त्र—चिति को स्वतंत्र इसलिए कहा है क्योंकि चाहे सृष्टि हो, चाहे स्थिति, चाहे संहार—किसी के लिए भी वह दूसरे की अपेक्षा नहीं करती। सब कुछ करने में वह स्वयं समर्थ है। ३०. भोगमोक्षरूपी विश्वसिद्धि—एक ऊँची दृष्टि से विश्वसिद्धि का अर्थ भोग और मोक्ष की सिद्धि है। जब चित्शक्ति के स्वातंत्र्य की पहचान हो जाती है तो वह भोग (वास्तविक स्वात्मचमत्कार रूपी भोग) और मोक्ष दोनों की जननी हो जाती है। ३१. प्रमाणोपारोहक्रमेण—प्रमाण के आरोहक्रम से। यह आरोहक्रम इस प्रकार है—प्रमेय को साधक प्रमाणरूप, ज्ञेय को ज्ञान रूप में जानने लगता है, यह पहली सीढ़ी है, फिर प्रमाण को प्रमाता के रूप में, ज्ञान को ज्ञाता के रूप में जानने लगता है। प्रमाण की विश्रान्ति प्रमाता में होती है। यही विमर्शमय प्रमाता के साथ तादात्म्य है। ३२. ब्रह्मवाद से तात्पर्य है शांकर वेदान्त जिसमें चित् कर्तृत्व से हीन है ३३. कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे कोई नगर जो दर्पण में दिखलाई देता है वस्तुतः दर्पण से अभिन्न है किन्तु भिन्न जैसा दिखलाई देता है वैसे ही विश्व भी चित् से वस्तुतः अभिन्न है, किन्तु भिन्न जैसा प्रतीत होता है। ३४. सदाशिवतत्व—यह एक प्रकार से प्रथम अभिव्यक्ति है। शिव शक्ति से सदाशिव अभिव्यक्त होता है जिसका परामर्श होता है 'अहमिदम्'—मैं यह

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हूँ। इदम् अर्थात् यह अखिल विश्व का निर्देश करता है। अहं अर्थात् मैं दिव्य प्रमाता सदाशिव का निर्देश करता है। यह सर्व व्यापी अहं (मैं) है। जब परं की अभिव्यक्ति प्रारम्भ होती है तो उसका सर्वप्रथम परामर्श होता है मैं यह हूँ (अहमिदम्) यह अर्थात् अखिल विश्व तो पहले से ही अव्यक्त रूप से परं (परमेश्वर) की चेतना में निहित रहता है। किन्तु जब परमेश्वर अपने को यह के रूप में प्रकट करता है, तो यही इस स्थूलरूप से व्यक्त होने वाले विश्व की प्रथम झांकी है। यह वह अवस्था है जिसमें यह (इदम्) रूप अस्फुट है और मैं (अहम्) रूप स्फुट है। इस अवस्था में विश्व अहन्ता (मैं) से आच्छादित है, और उसका इदन्ता (यह) रूप अस्फुट है, जिसमें विश्व सदाशिव से अभिन्न अर्थात् पर भी हैं और एक प्रकार से भिन्न अर्थात् अपर भी है। इसी से विश्व को परापर (पर+अपर) कहा है 'मैं यह हूँ' इस परामर्श में 'होना' (सत्) स्पष्ट है। यह सदाशिव का परामर्श है। इसलिए सदाशिवतत्व को सादाख्य (सत्-होना) भी कहते हैं। इस तत्व में इच्छा प्रधान है। इस दर्शन में प्रमाताओं का जो उच्चावचत्व (ऊँचा-नीचा स्तर) है उसे अब बतलाते हैं। जिसने सदाशिवतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वह प्रमाता मंत्रमहेश्वर कहलाता है। वह अखिल विश्व से तादात्म्य अनुभव करता है। ३५. ईश्वरतत्व—अभिव्यक्ति का यह दूसरा स्तर है। इसमें 'मैं' (अहन्ता) और 'यह' का परामर्श एक ही दर्जे का है अर्थात् दोनों का परामर्श समान रूप से स्फुट है। विश्व जो कि 'पर' (परमशिव) की चेतना में अव्यक्त रूप से निहित है, ईश्वर तत्व के स्तर पर यह (इदं) के रूप में सदा- शिवतत्व की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त हो जाता है। ईश्वरतत्व में ज्ञान प्रधान है। जिन्होंने ईश्वरतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वे इस तत्व में अवस्थित होते हैं। वे मंत्रेश्वर कहलाते हैं। ईश्वर तत्व का परामर्श है 'इदम् अहम्' (यह मैं हूँ) इसमें यह अर्थात् विश्व अस्फुट रूप में नहीं रहता परन्तु उतना ही स्फुट हो जाता है जितना कि 'मैं'। इस अस्तर में 'मैं' और 'यह' की चेतना समान रूप से स्फुट रहती है। फिर भी 'यह' अथवा विश्व का 'मैं' से भिन्न बोध नहीं होता। सदाशिव और ईश्वर दोनों तत्वों में ग्राहक और ग्राह्य, मैं और यह में भेद नहीं है। केवल सदाशिव तत्व में अहं अथवा मैं अधिक फुस्ट है और इदं अथवा विश्व कम स्फुट है और ईश्वर तत्व में मैं और यह (विश्व) दोनों समानरूप से स्फुट हैं। इस स्तर के प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' के अधिष्ठाता ईश्वर हैं। ३६. विद्या या शुद्धविद्यातत्व—यह वह तत्व है जिसमें अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों का ज्ञान भिन्न होता है। यहाँ से भेद प्रारम्भ होता है, किन्तु भेद के भीतर अभेद वर्तमान रहता है। इस तत्व में क्रिया प्रधान रहती है।

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८ टिप्पणियाँ ११३ इस तत्त्व के प्रमाता 'मंत्र' कहलाते हैं जो कि भेद देखते हैं, किन्तु अभेद में वह भेद भासित होता है। इन प्रमाताओं का अधिष्ठाता अनन्त भट्टारक है। इस तत्त्व के प्रमाता का परामर्श होता है 'इदं च अहं च', यह (विश्व) भी है और मैं भी हूँ, अर्थात् विश्व मुझसे भिन्न है, किन्तु सर्वथा भिन्न नहीं है। 'यह' या विश्व 'मैं' से अलग प्रतीत होते हुए भी 'यह' अथवा विश्व 'मैं' का ही एक प्रारूप है। 'यह' 'मैं' से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसी से इस स्थिति का ज्ञान 'शुद्ध-विद्या' है। ३७ विज्ञानाकल--शुद्ध विद्या से नीचे और माया से ऊपर विज्ञानाकल की स्थिति है। विज्ञानाकल = विज्ञान + अकल-अर्थात् उसमें विज्ञान (बोध) है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है। पूर्व अवस्था में परिचित सकल और प्रलयाकल ही उसके प्रमेयक्षेत्र हैं। विज्ञानाकल उनसे अपना अभेद अनुभव करता है। इसमें से मायीय और कार्ममल चले जाते हैं, केवल आणव मल रह जाता है। ३८. शून्यप्रमाता अथवा प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली-इसको स्पष्टरूप से न अहं (मैं) का बोध होता है, न इदं (जगत्) का। जिस प्रकार सुषुप्ति में शून्य जैसा भान होता है उसी प्रकार इसे शून्य का भान होता है जो कि प्रायः कुछ नहीं के समान है। प्रलयाकल वह प्रमाता है जो संहार और सृष्टि के बीच में प्रकृति से तादात्म्य रखता है। शून्यावस्था में पहुँचे हुए योगी भी प्रलयाकल प्रमाता ही हैं। प्रलयकाल में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर, नई सृष्टि के आरम्भ होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व के भीतर विद्यमान रहता है। इसमें आणव और मायीय मल वर्तमान रहते हैं। कार्म मल चला जाता है। ३६. सकल--ये वे देव और जीव हैं जिन्हें सच्चा आत्मज्ञान नहीं होता और जिनकी चेतना मुख्यतः भेद की होती है। ये आणव, मायीय और कार्म तीनों मलों से आछन्न होते हैं। ४०--केवल प्रकाशरूप कहने का तात्पर्य यह है कि इस स्थिति में विमर्श अस्फुट है, प्रकाश ही स्फुट है। तीसरे सूत्र में प्रतिपादित विषय को हम एक सारणी में इस प्रकार रख सकते हैं :--

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ११४ तत्त्व | अधिष्ठाता | प्रमाता | तदनुरूप प्रमेय १. शिव तत्त्व | शिवभट्टारक | शिवप्रमाता | सब कुछ प्रकाशमय या शिवरूप । २. सदाशिव तत्त्व। इसमें इच्छा प्रधान है । | सदाशिवभट्टारक | मंत्रमहेश्वर जिसे अहं या शिव का भी स्फुट ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व का भी अस्फुट रूप से ज्ञान है इस अवस्था में विश्व अपना ही एक रूप या भाव है। | इदन्ता या विश्व का अस्फुट ज्ञान जो आत्म बोध से भिन्न नहीं है ।. ३. ईश्वर तत्त्व । इसमें ज्ञान प्रधान है । | ईश्वरभट्टारक | मंत्रेश्वर जिसको ईश्वर के समान अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों का समान रूप से ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व अहं से बाह्य या पृथक् नहीं है। | अहन्ता और इदन्ता दोनों का समान रूप से स्फुट ज्ञान । अभी विश्व आत्मा से सर्वथा बाह्य या पृथक् नहीं है । ४. शुद्धविद्या तत्त्व या सद्विद्या तत्त्व । इसमें क्रिया प्रधान है । | अनन्तभट्टारक | मंत्र, जिसमें अहं और इदं दोनों भिन्न हो गये हैं किन्तु अभी अहं-संवित्ति से इदं पूर्णतया बाह्य और पृथक् नहीं हुआ है। | प्रत्येक वस्तु का भेदज्ञान होते हुए भी सबका आत्मा से सम्बन्ध का ज्ञान, आत्मा का ही रूप जान पड़ना । ५. महामायातत्त्व (माया से ऊपर) | ✕ | विज्ञानाकल (इसमें केवल आणव मल है मायीय और कार्म मल चले गये हैं। बोध है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है)। | पूर्व परिचित प्रलयाकलों और सकलों का ज्ञान । ६. मायातत्त्व | ✕ | प्रलयाकल या प्रलयकेवली अथवा शून्यप्रमाता । इसमें से कार्ममल चला गया है किन्तु आणव और मायीय मल है। | शून्य ७. शेषतत्त्व पृथिवी तक | ✕ | सकल-देवों से लेकर वृक्षों और खनिज पदार्थों तक । इनमें आणव मायीय और कार्म तीनों मल वर्तमान हैं। | प्रत्येक वस्तु का एक दूसरे से भिन्न और अपने से भी भिन्न होने का ज्ञान ।

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विज्ञानाकल से सकल तक कोई अधिष्ठाता नहीं है, क्योंकि विज्ञाना- कल से महामाया का कार्य प्रारम्भ हो जाता है, और महामाया से अज्ञान प्रारम्भ हो जाता है। ४१. अनाश्रितशिव—जब चिदैक्य ( जिसमें चित्त और विश्व एक ही है ) का अपने स्वातंत्र्य से बोध हट जाता है तो उस अवस्था का नाम अनाश्रितशिव है। यह शक्तितत्त्व और सदाशिव तत्त्व के बीच की अवस्था है। यह ध्यान रहे कि यह अवस्था मात्र है, तत्त्व नहीं है। यह वह अवस्था है जिसमें शक्ति आत्मा से विश्व का निषेध कर देती है और इस प्रकार आत्मस्वरूप का आवरण हो जाता है जिसके कारण आत्मस्वरूप की अख्याति अर्थात् अज्ञान हो जाता है। यह अख्याति शिव अपने स्वातंत्र्य से ही अपने में उत्पन्न कर लेता है। उसकी शक्ति उसका स्वातंत्र्य है। शक्ति विश्व का अहं ( शिव ) से निषेध कर देती है। इसलिए शक्ति को “स्वरूपरूपा- पोहनात्माख्यातिमयी निषेधव्यापाररूपा” ( परमार्थसार० पृ० १० में ) कहा है। पूर्ण अहं में अहं और विश्व एक है। विश्व का अहं से पृथक् हो जाना अहं का अपूर्ण हो जाना है। विश्व का पुनः अहं से एकीभाव कर लेना अपूर्ण अहं को पूर्ण बना लेना है। अहं का अपूर्ण हो जाना संसार है। अहं का पुनः पूर्ण हो जाना मुक्ति है। ४२. शून्य से भी अधिक शून्य अर्थात् अत्यन्त शून्य। विश्व के निषेध हो जाने के कारण, प्रमेय के सर्वथा अभाव के कारण इस अवस्था को शून्यातिशून्य कहा है। ४३. त्रिशिरोमते—त्रिशिरोमत ग्रन्थ में तीन शिर वाले भैरव के रहस्य का प्रतिपादन किया गया है। भैरव के तीन शिर शिव की तीन शक्तियों परा, परापरा और अपरा—के प्रतीक हैं। परा वह स्थिति है जिसमें शिव और शक्ति अभिन्न है। परापरा वह स्थिति है जिसमें भेद में अभेद है। अपरा वह स्थिति है जिसमें ग्राहक और ग्राह्य में पूर्ण भेद है। ४४. सर्वदेवमयः कायः । विश्व एक ऐसा शरीर माना गया है जो कि सभी देवों से बना है। सभी प्रमाता और प्रमेय देवरूप माने गये हैं। यही प्रमाता—प्रमेय रूप विश्व प्रभु का शरीर है। एक दूसरा पाठ है सर्वतत्त्वमयः कायः अर्थात् विश्वरूपी शरीर सभी तत्त्वों का बना हुआ है। ४५. प्रिये—आगमशास्त्र बहुत कुछ शिव और पार्वती के संवाद रूप में है जिसमें शिव पार्वती को आगम के सिद्धान्तों को बतलाते हैं। पार्वती को यहाँ ‘प्रिये’ कहकर सम्बोधित किया है।

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११६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ४६. भैरवः- भैरव का अर्थ है भयानक । यह शिव का वह भयानक रूप है जो हमारी दुष्प्रवृत्तियों का समूल उच्छेदन कर देता है । इसका निरुक्त इस प्रकार है 'भैरव' भ, र, व इन तीन अक्षरों से बना है । भ- भरण अर्थात् विश्व की स्थिति का द्योतक है । र-रवण अर्थात् विश्व के संहार का द्योतक है । व-वमन अर्थात् विश्व की सृष्टि का द्योतक है । इस प्रकार भैरव सृष्टि स्थिति और संहार तीनों का द्योतक है । इसको तीन शिर वाला इसलिए कहा है क्योंकि यह अपनी तीन शक्तियाँ परा, परापरा और अपरा । (दे० टि० ४३) का प्रतीक है, अथवा नर, शक्ति, शिव इन तीनों का प्रतीक है । ४७. क्षेमराज ने पहले यह श्लोक कहाँ लिखा है इसका पता नहीं चलता । इस श्लोक का भाव एक विरोधाभास के रूप में रखा गया है । अख्याति (अज्ञान) का क्या भाव हैं ? क्या यह प्रकाश में आती है या नहीं (अर्थात् अनुभूत होती हैं या नहीं ?) यदि अख्याति वह है जो 'न ख्याति' अर्थात् प्रकाश में नहीं आती तब तो अख्याति कुछ है ही नहीं । केवल ख्याति (ज्ञान चित्) बच रही । यदि अख्याति भी प्रकाशित होती है अर्थात् अख्याति भी ख्याति है तब तो और भी ख्याति ही सब कुछ है, अख्याति कुछ नहीं है । ख्याति (चित्) का किसी भी प्रकार से निरास नहीं किया जा सकता । ४८. यह उद्धरण स्पन्दकारिका के द्वितीय निष्यन्द के तृतीय और चतुर्थ श्लोक से लिया गया है । ४६. विकल्प का अर्थ है विशेष या विविध कल्पना, एक विषय या विचार को औरों से पृथक् रूप में देखना या जानना, पृथक् ज्ञान, भिन्न ज्ञान । विकल्पन या विकल्प की क्रिया का अर्थ है- "विशेषेण विविधेन वा कल्पनम्" अर्थात् यह समझना कि यह औरों से विशिष्ट है, पृथक् है, भिन्न है । विकल्पन चित्त की वह क्रिया हैं जिसके द्वारा 'एक' 'दूसरे' से विशिष्ट रूप में देखा या समझा जाता है । व्यष्टिचित्त का यही स्वभाव है कि वह विकल्प करता है, 'एक' को 'दूसरे' से विशिष्ट करता है, भिन्न रूप में देखता है । योगराज ने अभिनवगुप्त के परमार्थसार के ११वें श्लोक में आये हुए विकल्प शब्द पर जो विवृत्ति लिखी है वह बहुत ही उद्बोधक है । वह इस प्रकार है-"विकल्पो हि अन्यापोहलक्षणो द्वयं घटाघटरूपं आक्षिपन् अध- टात् व्यवच्छिन्नं घटं निश्चिनोति" अर्थात् विकल्प का यह लक्षण है कि वह औरों को छुड़ाकर एक को पकड़ता है । यदि घट (घड़ा) को जानना है

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टिप्पणियाँ ११७ तो घट और अघट को सामने रखते हुए अघट को हटाकर, घट को अघट से पृथक् कर उसका निश्चित ज्ञान करना विकल्प है। जीव का चित्त विकल्पमय है, शिव तो निर्विकल्प है। प्रश्नकर्त्ता का अभिप्राय यह है कि चित्त का तो स्वभाव विकल्प है और शिव निर्विकल्प है। तो फिर जब तक चित्त है तब तक जीव और शिव अभिन्न कैसे माने जा सकते हैं ? पतञ्जलि के योगसूत्र (समाधिपाद के नवें सूत्र) में विकल्प शब्द भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वहां विकल्प का अर्थ है वह कल्पना जो केवल एक मानसिक व्यापार है, शब्द मात्र है किन्तु जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं है। ५०. चित्त का अर्थ है जीव की, व्यक्ति की चेतना। ५१. विद्याप्रमाता—विद्यातत्त्व में स्थित प्रमाता अर्थात् मंत्र। ५२. दे० टिप्पणी ३४, ३५, ४०। ५३. शुद्धाध्व—शिव सदाशिव ईश्वर और शुद्धविद्या शुद्धाध्व कहलाते हैं। मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्र महेश्वर इत्यादि शुद्धाध्व प्रमाता कहलाते हैं। ५४. दे० टि० ३८। शून्यादि में 'आदि' पद से सकल को समझना चाहिए, अर्थात् शून्यप्रमाता और सकल। ५५. इसका भाव यह है कि जो शिवदशा में ज्ञान है वह पशुदशा में सत्व के रूप में प्रकट होता है, जो शिवदशा में क्रिया है वह पशु या जीवदशा में रजस् के रूप में प्रकट होती है, जो शिवदशा में माया है वह पशुदशा में तमस् के रूप में प्रकट होती है। ५६. जिससे सारे विश्व का उद्भव होता है, जो विश्व का मूल है वह प्रकृति अथवा मूलप्रकृति कहलाता है। प्रकृति के तीन गुण हैं जो सत्व, रजस् और तमस् कहलाते हैं। गुण का अर्थ यहाँ विशेषण नहीं है प्रत्युत डोरी या धागा। प्रकृति सत्व, रजस् तमस् रूपी डोरियों से बटी हुई है। सत्व का स्वभाव प्रकाश है जिसके द्वारा ज्ञान, अच्छाई और सुख का अनुभव होता है। रज का स्वभाव प्रवृत्ति अथवा क्रिया है जिसके द्वारा दुःख अथवा क्षोभ का अनुभव होता है। तम का स्वभाव स्थिति (रुका रहना) है जिसके द्वारा मोह का अनुभव होता है। ५७. दे० विकल्प : टि० ४८। ५८. अशुद्ध अध्वा के ग्राहक को मायाप्रमाता कहते हैं। माया प्रमाता वह प्रमाता है जो माया के राज्य में है। प्रलयाकल और सकल दोनों मायाप्रमाता के अन्तर्गत हैं। दे० टि०और ३१।

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११८ प्रत्यभिज्ञाहृदय ५६. स्वातंत्र्य—स्वतंत्र का भाव स्वातंत्र्य है। इसका अर्थ है अपना ही तंत्र, अपना ही राज्य "प्रकाश प्राण इत्यादि संकोच अपने स्वातंत्र्य से ग्रहण करता है"—यह कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपनी ही इच्छा से, अपने ही अधिकार से ऐसा करता है, माया इत्यादि से वशीभूत होकर नहीं। ६०. मल का अर्थ है, अशुद्धता, चैतन्यरूपी सुवर्ण को जो ढक लेता है वह मल है। इस दर्शन में ब्रह्माण्ड अथवा पिण्डाण्ड की वे संकुचित अवस्थाएं मल कहलाती हैं जिनके कारण आत्मा की वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं हो पाती। मल तीन प्रकार का होता है—आणव, मायीय और कार्म। आणवमल मूल मल है जो कि परम चैतन्य को संकुचित करके अणु बना देता है। अणु का अर्थ है क्षुद्र, अत्यन्त परिच्छिन्न बिन्दु । यह मल वह संकुचित दशा है जिसके कारण परम चैतन्य का वास्तविक स्वरूप ढक जाता है। सारी सृष्टि शिव और उसकी शक्ति का खेल है। परम चैतन्य में बोध और शक्ति दोनों साथ ही साथ हैं। किन्तु अणु दशा में उसकी महिमा गोपित हो जाती है और वह अपने स्वरूप को भूल सा जाता हैं। अपने को अपूर्ण समझना 'अपूर्णमन्यता'—पूर्ण स्वरूप का अज्ञान, संकोच या अणुता—आणव मल है। दो प्रकार के संकोच से आणव मल होता है (१) जो परम चैतन्य में बोध है उसका स्वातंत्र्य (शक्ति) चला जाता है। इसी मल के कारण जीव अपने को अपूर्ण रूप में अनुभव करता है। (२) जो परम चैतन्य का स्वातंत्र्य या शक्ति है उसमें अबोधता आ जाती है। मायीय मल वह परिसीमित स्थिति है जो माया के द्वारा आविर्भूत होती है। उसी माया के द्वारा जीव को सूक्ष्म और स्थूल शरीर प्राप्त होता है। यह माया विश्वव्यापी है। यह भिन्नवेद्य प्रथा वाली है अर्थात् यह भिन्न कोशों और आकृतियों के कारण सब वेद्य वा ज्ञेय पदार्थों को भिन्न भिन्न प्रदर्शित करती है। कार्ममलः—अन्तःकरण की प्रेरणा से ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों द्वारा निष्पन्न कर्म की जो वासनाएं अथवा संस्कार चित्त में रह जाते हैं उन्हें कार्ममल कहते हैं। यही वासनाएं जीव को एक जन्म से दूसरे जन्म की ओर प्रवृत्त करती हैं। यहां यह ध्यान में रखना चाहिए कि विज्ञानाकल में केवल एक आणव मल होता है। प्रलयाकल में दो अर्थात् आणव और मायीय मल होते हैं और सकल में आणव, मायीय और कार्म तीनों मल होते हैं।

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टिप्पणियाँ ११६ ६१. शून्यस्वभाववाला—अर्थात् प्रलयकेवली अथवा शून्यप्रमाता । दे० टि० ३८ । ६२. पुर्यष्टकः अर्थात् अष्ट (आठ) की पुरी वाला । तंत्र में सूक्ष्मशरीर या लिंग शरीर को पुर्यष्टक कहते हैं । यह पुर्यष्टक पाँच तन्मात्राओं, मन, बुद्धि और अहंकार की समष्टि है । यही संस्कारों अथवा वासनाओं का आशय है । ६३. दे० टि० १८ । ६४. उपाधि (उप + आ + √ धा)—जो पास में रक्खी हो, जो किसी वस्तु को—बिना उसके अंग बने हुए—परिसीमित कर दे । ६५. सुगत ( जो अच्छी तरह गया है ) भगवान् बुद्ध के लिए प्रयुक्त होता है । इसलिए बुद्ध के अनुयायी को सौगत कहते हैं । ६६. मध्यमक दर्शन के अनुयायी माध्यमिक कहलाते हैं । मध्यमक दर्शन बौद्धों का वह दर्शन है जो यह विश्वास करता है कि तत्त्व को हम किसी बौद्धिक प्रत्यय से नहीं व्यक्त कर सकते । वह सत् असत् इत्यादि बुद्धि की किसी भी कोटि में नहीं बाँधा जा सकता । वह सब कोटियों के मध्य में है । उसके लिए किसी शब्द का प्रयोग करना उसे परिसीमित करना है । तत्त्व को हम केवल शून्य ही कह सकते हैं । ६७. पांचरात्रः—पांचरात्र वैष्णवों का मुख्य दर्शन है । पांचरात्र के माननेवाले भी संस्कृत में पांचरात्र ही कहलाते हैं । पांचरात्र शब्द कैसे बना यह स्पष्ट नहीं है । सम्भवतः कुछ कर्म ( धार्मिक कृत्य ) पाँच रात तक चलते रहे, उसी के आधार पर यह शब्द बना है । ६८. प्रकृति से यहाँ सांख्य की प्रकृति का तात्पर्य नहीं है । यहाँ पर पराप्रकृति का अर्थ है परमोत्कृष्ट कारण । पांचरात्र दर्शन यह मानता है कि वासुदेव ही सारी सृष्टि के उपादान और निमित्त दोनों कारण हैं । ६६. पांचरात्र जीव को वासुदेव का परिणाम मानता है । शंकराचार्य ने भी ब्रह्मसूत्र के ‘उत्पत्ति असम्भवाधिकरणम्’ पर अपने भाष्य में कहा है । ‘तेषां वासुदेवः पराप्रकृतिरितरे संकर्षणादयः कार्यम्’ अर्थात् पांचरात्रो के मत में सर्वोत्कृष्ट कारण वासुदेव हैं । संकर्षण इत्यादि अन्य जीव कार्य हैं । ७०—क्षेमराज ने यहाँ थोड़ी सी भूल की है । पांचरात्र लोग ‘अव्यक्त’ को परम तत्त्व नहीं मानते । वासुदेव को ही परम तत्त्व मानते हैं और वासुदेव को ‘अव्यक्त’ से बढ़ कर मानते हैं । शंकराचार्य ने भी ब्रह्मसूत्र की ‘उत्पत्ति-असम्भवाधिकरणम्’ के भाष्य में इसकी पुष्टि की है-‘तत्र यत्

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१२० प्रत्यभिज्ञाहृदय तावदुच्यते योऽसौ नारायणः परोऽव्यक्तात् प्रसिद्धः परमात्मा सर्वात्मा स आत्मनात्मानमनेकधा व्यूहावस्थित इति, तन्न निराक्रियते”। ७१. सांख्याः का अर्थ यहाँ “सांख्य के अनुयायी” है । ७२ दे० टि० ३७ । ७३. यहाँ पर वैयाकरण से तात्पर्य है “व्याकरणदर्शन के अनुयायी”। व्याकरणदर्शन का संक्षिप्त वर्णन माधव द्वारा लिखित सर्वदर्शन-संग्रह के पाणिनिदर्शनम् नामक अध्याय में दिया हुआ है। यहाँ भर्तृहरि के वाक्य- पदीय का संकेत है जिसमें पश्यन्ती को (शब्द-ब्रह्म माना है। ७४-७५. व्याकरण दर्शन शब्द-ब्रह्म को परमार्थ मानता है। वैयाकरण शब्द को चैतन्य मानते हैं। उनके अनुसार शब्द वह है जिसमें चिन्तन और वचन एकी-भूत रहते हैं। ब्रह्म वह शाश्वत शब्द या स्पन्दन है जिससे सब कुछ प्रादुर्भूत होता है, त्रिकदर्शन के अनुसार से भी पदार्थ, विचार और शब्द अव्यक्त रूप में परमशिव में वर्तमान है। यह परावाक् की भूमि है। इस भूमि में पद और अर्थ एकीभूत रहते हैं। दूसरी भूमि पश्यन्ती की है। इस भूमि में विश्व चैतन्य की दृष्टि में एक अविशेष रूप में स्थित रहता है जो कि मानव की अनुभूति से परे है। क्षेमराज का कहना है कि वैयाकरण पश्यन्ती भूमि ही को शब्दब्रह्म की सर्वोच्च दशा मानते हैं। त्रिक के अनुसार यह भूमि तो केवल सदाशिव तक परिसीमित है। वैयाकरण परावाक् को नहीं जानते जो कि परमशिव का ज्ञापक है। पश्यन्ती भूमि के अनन्तर मध्यमा भूमि है जो पश्यन्ती भूमि के अविशेष और वैखरी भूमि के विशेष के मध्य की अवस्था है। वैखरी व्यावहारिक विचार और वचन की भूमि है जिसमें मुख्यतः विशेषों का अनुभव होता है। मध्यमा पश्यन्ती और वैखरी के बीच की एक कड़ी है। वह अन्तःकरण में विचार और वचन की एक सूक्ष्म अवस्था है। वैखरी में पद (शब्द) विचार और अर्थ (वस्तु) से भिन्न प्रतीक होता है। ७६. “आगम” उस विद्या को कहते हैं जो सदा गुरु-शिष्य की परम्परा से चली आ रही हो। यहाँ आगम से तात्पर्य है शैवदर्शन की परम्परा । ७७. आर्हत का यहाँ तात्पर्य है जैनियों से । उनका कहना है कि विश्व परमाणुओं से बना हुआ है जो कि शाश्वत हैं। इनके भिन्न-भिन्न गुण होते हैं। इसलिए इनमें परिवर्तन होता रहता है। यहाँ जो आगम का वचन उद्धृत किया गया है उसका तात्पर्य यह है कि जैन इन गुणों को ही परमार्थ रूप समझते हैं और इनके आगे नहीं जा पाते । ७८. पांचरात्रिक : दे० टि० ६७ ।

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टिप्पणियाँ १२१ ७६. तान्त्रिक-तन्त्र के अनुयायी तान्त्रिक कहलाते हैं । तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से बतलाई गई है । (१) तन् धातु से जिसका अर्थ है तानना, विस्तार करना । इस दृष्टि से तन्त्र का अर्थ हैं वह शास्त्र जिसमें सृष्टि और जीवन के तत्त्व विस्तारपूर्वक समझाये गये हैं । (२) तन्त्र धातु से जिसका अर्थ है शासन करनां, स्वायत्त करना । इस दृष्टि से तन्त्र का अर्थ है वह शास्त्र जो यह बतलांता है कि विभिन्न शक्तियों को किस प्रकार स्वायत्त करना चाहिए । ८०. कुल शब्द का अर्थ इस सन्दर्भ में शक्ति है । कुलादि आम्नायों का यहाँ तात्पर्य है शाक्त शास्त्र । ८१. त्रिक् का अर्थ है तीन का समूह शिव, शक्ति और नर । प्रत्य- भिज्ञा दर्शन का यह दूसरा नाम है । इसके अनुसार परम अर्थ परमशिव है जो तीन के समूह शिव, शक्ति और नर में अभिव्यक्त होता है । त्रिकादि में जो आदि शब्द है उससे त्रिपुरा अथवा महार्थ समझा जा सकता हैं । ८२. परशक्तिपात-शक्तिपात अर्थात् अनुग्रह दो प्रकार का है (१) पर और (२) अपर । परशक्तिपात से अवच्छिन्न (परिसीमित) जीव पूर्ण शिव की चेतना में रूपान्तरित हो जाता है । यह शक्तिपात केवल परमेश्वर द्वारा हो सकता है । अपरशक्तिपात् से यद्यपि अवच्छिन्न जीव शिव से अपने तादात्म्य का अनुभव कर लेता है तथापि वह अभी यह अनु- भव नहीं करता कि सारा विश्व उसी की अभिव्यक्ति है और वह इस प्रकार शिव की चेतना को नहीं प्राप्त कर पाता । अपर शक्तिपात गुरु अथवा देव द्वारा हो सकता है । ८३. 'विद्या' का अर्थ यहाँ पर वह अशुद्ध विद्या है जो कि माया के पाँच कंचुकों में से एक हैं। इससे वह परिमितता आ जाती है जिसके कारण जीव को परमार्थ का सम्यक् ज्ञान नहीं हो पाता । ८४. तुरीय का अर्थ है चौथा । संस्कृत में 'चतुर्' शब्द का अर्थ है चार । चतुर् शब्द का 'च' लोप हो जाने से और ईयट् प्रत्यय के लग जाने से (चतुर् + ईयट्) तुरीय शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है चौथा । संवित् शब्द स्त्री लिंग है । इसलिए उसका विशेषण भी स्त्रीलिंग होना चाहिए । इस प्रकार मूल में 'तुरीया संवित्' शब्द आया है । प्रत्येक व्यक्ति की चेतना की तीन अवस्थाएं होती हैं जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति (गहरी नींद जिसमें न जागरण है, न स्वप्न) । जब जाग्रत् अवस्था होती है, तब न स्वप्न रहता

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१२२ प्रत्यभिज्ञाहृदय है, न सुषुप्ति । जब स्वप्नावस्था रहती है, तब न जाग्रत् रहता है, न सुषुप्ति । जब सुषुप्ति अवस्था होती है, तब न जाग्रत रहता है, न स्वप्न । व्यक्ति को इन तीनों अवस्थाओं का पृथक् पृथक् भान होता है। किन्तु व्यक्ति के भीतर एक चौथी अवस्था भी है जो सभी अवस्थाओं का साक्षी है । यह तुरीयावस्था है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-इन तीनों की अपेक्षा से उसे तुरीया (चौथी) अवस्था कहते हैं। तुरीया चेतना में कोई क्रम वा भंग नहीं होता । वह चेतना सदा तीनों अवस्थाओं का साक्षीरूप से वर्तमान रहती है। वह जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं को सदा धारण किये रहती हैं। देह, प्राण, मन इत्यादि से परिच्छिन्न जीव को उस तुरीया का अनुभव नहीं होता यद्यपि वह उसमें सदा वर्तमान रहती है। अविद्या हट जाने पर, आत्मिक ज्ञान के उदय होने पर तुरीया का अनुभव होता है। वही हमारी चेतना का वास्तविक स्वरूप है जिसकी अनुभूति जिन सीमाओं में हमारी चेतना बँधी हुई है उनको अतिक्रान्त करने पर होती है। व्यष्टि की दृष्टि से तुरीया चेतना जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं को धारण किये रहती है, किन्तु वह यह तीनों अवस्थाओं से भिन्न है। समष्टि की दृष्टि से तुरीया सृष्टि, स्थिति, संहार को धारण किये रहती है (सृष्टिस्थिति संहार-मेलन रूपा इयं तुरीया ) । जैसे एक सूत्र भिन्न भिन्न पुष्पों को माला में धारण किये हुए रहता है, इसी प्रकार तुरीया तीनों अवस्थाओं को एक में धारण किये रहती है। उसमें भंग नहीं होता । वह पूर्ण चेतना है, एकत्व की चेतना है । वह संहार की दृष्टि से पूर्ण कही गई है, क्योंकि उस दशा में वह सभी पदार्थों को अपने में समेट लेती है, उद्वमन अर्थात् सृष्टि की दृष्टि से वह कृशा (दुबली) कही गयी है, क्योंकि उस दशा में जो पदार्थ उसमें समेटे हुए थे वे उसमें से निकले जा रहे हैं। अतः वह उभयरूपा (पूर्णा और कृशा दोनों) है। परमार्थ दृष्टि से वह अनुभयात्मा (न पूर्ण, न कृशा) हैं, क्योंकि वह भरने और खो देने की अवस्थाओं से अतीत है । ८५. अणु और मल के लिए दे० टि० ६० । ८६. यहाँ कला का अर्थ है 'कर्तृत्व वा साधकता का संकोच वा परि- च्छिन्नत्व' । दे० टि० १८ । ८७. मायीय मल—दे० टि० ६० । ८८. कार्ममल दे० टि० ६० । ८६. कला...नियति दे० टि० (१८) : १८ शक्ति के संकोच वा परिच्छिन्नत्व को निम्नलिखित सारणी में व्यक्त किया जा सकता है।