प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextप्रत्यभिज्ञाहृदय ११४ तत्त्व | अधिष्ठाता | प्रमाता | तदनुरूप प्रमेय १. शिव तत्त्व | शिवभट्टारक | शिवप्रमाता | सब कुछ प्रकाशमय या शिवरूप । २. सदाशिव तत्त्व। इसमें इच्छा प्रधान है । | सदाशिवभट्टारक | मंत्रमहेश्वर जिसे अहं या शिव का भी स्फुट ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व का भी अस्फुट रूप से ज्ञान है इस अवस्था में विश्व अपना ही एक रूप या भाव है। | इदन्ता या विश्व का अस्फुट ज्ञान जो आत्म बोध से भिन्न नहीं है ।. ३. ईश्वर तत्त्व । इसमें ज्ञान प्रधान है । | ईश्वरभट्टारक | मंत्रेश्वर जिसको ईश्वर के समान अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों का समान रूप से ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व अहं से बाह्य या पृथक् नहीं है। | अहन्ता और इदन्ता दोनों का समान रूप से स्फुट ज्ञान । अभी विश्व आत्मा से सर्वथा बाह्य या पृथक् नहीं है । ४. शुद्धविद्या तत्त्व या सद्विद्या तत्त्व । इसमें क्रिया प्रधान है । | अनन्तभट्टारक | मंत्र, जिसमें अहं और इदं दोनों भिन्न हो गये हैं किन्तु अभी अहं-संवित्ति से इदं पूर्णतया बाह्य और पृथक् नहीं हुआ है। | प्रत्येक वस्तु का भेदज्ञान होते हुए भी सबका आत्मा से सम्बन्ध का ज्ञान, आत्मा का ही रूप जान पड़ना । ५. महामायातत्त्व (माया से ऊपर) | ✕ | विज्ञानाकल (इसमें केवल आणव मल है मायीय और कार्म मल चले गये हैं। बोध है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है)। | पूर्व परिचित प्रलयाकलों और सकलों का ज्ञान । ६. मायातत्त्व | ✕ | प्रलयाकल या प्रलयकेवली अथवा शून्यप्रमाता । इसमें से कार्ममल चला गया है किन्तु आणव और मायीय मल है। | शून्य ७. शेषतत्त्व पृथिवी तक | ✕ | सकल-देवों से लेकर वृक्षों और खनिज पदार्थों तक । इनमें आणव मायीय और कार्म तीनों मल वर्तमान हैं। | प्रत्येक वस्तु का एक दूसरे से भिन्न और अपने से भी भिन्न होने का ज्ञान ।