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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

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विज्ञानाकल से सकल तक कोई अधिष्ठाता नहीं है, क्योंकि विज्ञाना- कल से महामाया का कार्य प्रारम्भ हो जाता है, और महामाया से अज्ञान प्रारम्भ हो जाता है। ४१. अनाश्रितशिव—जब चिदैक्य ( जिसमें चित्त और विश्व एक ही है ) का अपने स्वातंत्र्य से बोध हट जाता है तो उस अवस्था का नाम अनाश्रितशिव है। यह शक्तितत्त्व और सदाशिव तत्त्व के बीच की अवस्था है। यह ध्यान रहे कि यह अवस्था मात्र है, तत्त्व नहीं है। यह वह अवस्था है जिसमें शक्ति आत्मा से विश्व का निषेध कर देती है और इस प्रकार आत्मस्वरूप का आवरण हो जाता है जिसके कारण आत्मस्वरूप की अख्याति अर्थात् अज्ञान हो जाता है। यह अख्याति शिव अपने स्वातंत्र्य से ही अपने में उत्पन्न कर लेता है। उसकी शक्ति उसका स्वातंत्र्य है। शक्ति विश्व का अहं ( शिव ) से निषेध कर देती है। इसलिए शक्ति को “स्वरूपरूपा- पोहनात्माख्यातिमयी निषेधव्यापाररूपा” ( परमार्थसार० पृ० १० में ) कहा है। पूर्ण अहं में अहं और विश्व एक है। विश्व का अहं से पृथक् हो जाना अहं का अपूर्ण हो जाना है। विश्व का पुनः अहं से एकीभाव कर लेना अपूर्ण अहं को पूर्ण बना लेना है। अहं का अपूर्ण हो जाना संसार है। अहं का पुनः पूर्ण हो जाना मुक्ति है। ४२. शून्य से भी अधिक शून्य अर्थात् अत्यन्त शून्य। विश्व के निषेध हो जाने के कारण, प्रमेय के सर्वथा अभाव के कारण इस अवस्था को शून्यातिशून्य कहा है। ४३. त्रिशिरोमते—त्रिशिरोमत ग्रन्थ में तीन शिर वाले भैरव के रहस्य का प्रतिपादन किया गया है। भैरव के तीन शिर शिव की तीन शक्तियों परा, परापरा और अपरा—के प्रतीक हैं। परा वह स्थिति है जिसमें शिव और शक्ति अभिन्न है। परापरा वह स्थिति है जिसमें भेद में अभेद है। अपरा वह स्थिति है जिसमें ग्राहक और ग्राह्य में पूर्ण भेद है। ४४. सर्वदेवमयः कायः । विश्व एक ऐसा शरीर माना गया है जो कि सभी देवों से बना है। सभी प्रमाता और प्रमेय देवरूप माने गये हैं। यही प्रमाता—प्रमेय रूप विश्व प्रभु का शरीर है। एक दूसरा पाठ है सर्वतत्त्वमयः कायः अर्थात् विश्वरूपी शरीर सभी तत्त्वों का बना हुआ है। ४५. प्रिये—आगमशास्त्र बहुत कुछ शिव और पार्वती के संवाद रूप में है जिसमें शिव पार्वती को आगम के सिद्धान्तों को बतलाते हैं। पार्वती को यहाँ ‘प्रिये’ कहकर सम्बोधित किया है।