प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
Page 120 of 187
Read in context११४ प्रत्यभिज्ञाहृदय २२. शिवभट्टारक—भट्टारक, भट्टार और भट्ट शब्द समानार्थक हैं। यह भट्ट शब्द भट् धातु में तन् प्रत्यय लगाकर बना है। भट् धातु भ्वादिगणीय है। इसका अर्थ है पोषण करना (भट् = भृतौ)। भट्ट का अर्थ है पोषणकरनेवाला, भर्ता, स्वामी। इसका प्रयोग राजाओं, ब्राह्मणों और विद्वानों के लिए आदरप्रदर्शनार्थ होता है। भट्टार—(भट्टं = स्वामित्वं ऋच्छति इति, ऋ-अण)। भट्टार वह है जो स्वामित्व को प्राप्त हो अर्थात् जो स्वामी हो। भट्टारक में भट्टार के ही अर्थ में 'क' प्रत्यय लगा है। भट्ट, भट्टार और भट्टारक तीनों एक ही अर्थ के द्योतक हैं। भट्टारक का अर्थ है पूज्यस्वामी। यह शिव के साथ आदरप्रदर्शन के लिए लगाया गया है। २३. नित्योदित—उदित-उत् + इ + क्त से बना हुआ है। इसका शाब्दिक अर्थ है 'ऊपर गया हुआ', 'उठा हुआ', 'उगा हुआ'। नित्योदित का अर्थ है जिसका नित्यउदय है। संसार में जिसका उदय होता है उसका अस्त भी होता है। इस प्रकार की उदित वस्तु को शान्तोदित कहते हैं। किन्तु जिसका सदा उदय है कभी अस्त होता ही नहीं, वह 'नित्योदित' है। चिति चित्-शक्ति है. वह वह मूल चेतना है, जिसका कभी अस्त नहीं होता। चिति केलिए केवल नित्य न कहकर नित्योदित (नित्य उगी हुई) कहने का तात्पर्य यह भी हैं कि वह सदा क्रियाशीला है, उसमें सदा स्पन्द वर्तमान है। २४. प्रमातृ—प्रमाता-विषयों का (चित्त द्वारा) माप कर लेनेवाला ज्ञाता। २५—प्रमाण—माप अथवा ज्ञान और प्रमाण या ज्ञान का करण या साधन। २६. प्रमेय—जो (चित्त द्वारा) माप लिया जाय; ज्ञेय; विषय। विश्वको प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेय-मय कहने का भाव यही है कि समस्त विश्व इन्हीं तीनों का पुञ्ज है। इसमें जो, विषय हैं वे प्रमेय या ज्ञेय हैं, इनको जाननेवाले प्रमाता या जीव हैं और जाननेवालों का, प्रमाण (ज्ञान) और उसका साधन है। इनके अतिरिक्त विश्व और कुछ नहीं है। २७. बैन्दवीकला—पर प्रमाता। वेत्तीति 'विन्दुः'। बिन्दुः विद् धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है 'जानना'। विन्दु अथवा बिन्दु का अर्थ है प्रमाता, ज्ञाता, वेदक। जो परम प्रमाता या संविद् है उसे विन्दु या बिन्दु कहते हैं। 'बिन्दोरियमिति बैन्दवी'। 'बैन्दवी' का अर्थ हुआ विन्दुसम्बन्धी 'कला' का अर्थ यहाँ शक्ति है। 'बैन्दवी कला' का अर्थ हुआ 'आत्मसंवित्ति' (आत्मा की जानने) की शक्ति। यहाँ पर इस