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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

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टिप्पणियाँ १११ इसका अर्थ है आत्मा की वह शक्ति जिससे वह सदा अपने को वेदक के ही रूप में जानता है। यहाँ पर सिर की उपमा आत्मा वा प्रमाता से दी गई है, और पैर की उपमा प्रमाण से। जैसे अपने पैर से कोई अपने सिर की छाया को नहीं लांघ सकता, वैसे ही प्रमाण प्रमाता को मापने या जानने में असमर्थ है। स्वयं प्रमाण का अस्तित्व और सिद्धि प्रमाता के द्वारा है, तो प्रमाण बेचारा प्रमाता के अस्तित्व को क्या सिद्ध करेगा। जिस प्रकार सिर की छाया पैर द्वारा नहीं पकड़ में आ सकती, उसी प्रकार प्रमाता प्रमाण की पकड़ में नहीं आ सकता। २८. सामरस्य—समरस अर्थात् एकरस का भाव। चित्शक्ति ही स्वतंत्ररूप से अर्थात् बिना किसी अन्य की अपेक्षा किये हुए परप्रमाता परम शिव से विश्व की सृष्टि द्वारा पृथक्त्व जैसी अवस्था निष्पन्न करती है, उस अवस्था को कुछ काल तक स्थित रखती है और फिर संहार कर लेती है अर्थात् विश्व को समेट कर उसी अद्वय परमशिव में समरस अर्थात् एकरूप कर देती है। २९. स्वतन्त्र—चिति को स्वतंत्र इसलिए कहा है क्योंकि चाहे सृष्टि हो, चाहे स्थिति, चाहे संहार—किसी के लिए भी वह दूसरे की अपेक्षा नहीं करती। सब कुछ करने में वह स्वयं समर्थ है। ३०. भोगमोक्षरूपी विश्वसिद्धि—एक ऊँची दृष्टि से विश्वसिद्धि का अर्थ भोग और मोक्ष की सिद्धि है। जब चित्शक्ति के स्वातंत्र्य की पहचान हो जाती है तो वह भोग (वास्तविक स्वात्मचमत्कार रूपी भोग) और मोक्ष दोनों की जननी हो जाती है। ३१. प्रमाणोपारोहक्रमेण—प्रमाण के आरोहक्रम से। यह आरोहक्रम इस प्रकार है—प्रमेय को साधक प्रमाणरूप, ज्ञेय को ज्ञान रूप में जानने लगता है, यह पहली सीढ़ी है, फिर प्रमाण को प्रमाता के रूप में, ज्ञान को ज्ञाता के रूप में जानने लगता है। प्रमाण की विश्रान्ति प्रमाता में होती है। यही विमर्शमय प्रमाता के साथ तादात्म्य है। ३२. ब्रह्मवाद से तात्पर्य है शांकर वेदान्त जिसमें चित् कर्तृत्व से हीन है ३३. कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे कोई नगर जो दर्पण में दिखलाई देता है वस्तुतः दर्पण से अभिन्न है किन्तु भिन्न जैसा दिखलाई देता है वैसे ही विश्व भी चित् से वस्तुतः अभिन्न है, किन्तु भिन्न जैसा प्रतीत होता है। ३४. सदाशिवतत्व—यह एक प्रकार से प्रथम अभिव्यक्ति है। शिव शक्ति से सदाशिव अभिव्यक्त होता है जिसका परामर्श होता है 'अहमिदम्'—मैं यह

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