प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context( ३६ ) जाता है, पूर्णत्व अपूर्णत्व ग्रहण कर राग बन जाता है, नित्यत्व काल बन जाता है, व्यापकत्व नियति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार आत्मा जीव बन जाता है, किन्तु अपनी शक्तियों के विकास होने पर वह शिवत्व लाभ करता है। सूत्र १०-संसारी की दशा में भी जीव पंचकृत्य करता रहता है । जैसे शिव विश्व के प्राकट्य में पंचकृत्य करते रहते हैं वैसे ही जीव रूपी संकुचित दशा में भी वह पंचकृत्य करते रहते हैं। किसी वस्तु का नियत देश-काल में आभासित होना सृष्टि क्रिया है। विषयों का अन्य देश-काल में आभासित होना संहार क्रिया है। किसी आभास का बना रहना स्थिति क्रिया है। भेद का आभास विलय क्रिया है। विषयों का चित्प्रकाश के तादात्म्य से प्रकासित होना अनुग्रह क्रिया है। सूत्र ११-वह प्रकाशन, आस्वादन, आत्मबोध, बीज का अवस्थापन, विलापन रूपी पंचकृत्य भी करता है। यह पंचकृत्य योगी के रहस्यमय दृष्टिकोण से होता है। जो कुछ प्रका- शित होता है, वह सृष्टि है। जब जीव उसका आस्वादन या आनन्द लेता है, तब वह स्थिति है। विमर्शन या चमत्कार के समय उस पदार्थ का संहार होता है। शंका इत्यादि के संस्कार खड़े हो जाते हैं, तो वह बीजरूप में संसार का कारण होता है। यह बीजावस्थापन विलय है। यदि अनुभूत विषय का चित् से तादात्म्य हो जाता है तो यह अनुग्रह की दशा है। सूत्र १२-संसार दशा पंचकृत्य के अज्ञान के कारण अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाना है। चित्प्रकाश से अभिन्न परावाक् शक्ति है। वह पूर्ण अहं ज्ञानरूपी है, 'अ' से लेकर 'क्ष' तक समस्त शक्ति-समूह को अपने गर्भ में धारण किये हुए है। वही पश्यन्ती इत्यादि क्रम से ग्राहक अवस्था की अवभासित करती है। ग्राहक भूमि में वह अपनी परा रूप का गोपन करके विशेष पदार्थों को अवभासित करती है जिसके कारण ग्राहक देह, प्राण इत्यादि को आत्मा मान बैठते हैं। ब्राह्मी इत्यादि शक्तियां पशुदशा में भेद उत्पन्न करती हैं और पतिदशा में अभेद का ज्ञान उत्पन्न करती हैं। क्रमशः वे शुद्ध विकल्प उत्पन्न कर देती हैं जिससे अभेद का ज्ञान सम्पन्न होता है। अभेद ज्ञान उत्पन्न करने का यह शाम्भवोपाय है।