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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 50 of 187

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Page 50

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शाक्तोपाय निम्नलिखित है। इस सन्दर्भ में चितिशक्ति को वामेश्वरी कहते हैं। खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी वामेश्वरी के प्रकार हैं। खेचरी शक्ति के द्वारा समष्टिचेतना व्यष्टिचेतना के रूप में, परिमित प्रमाता के रूप में प्रकट होती है, गोचरी शक्ति के द्वारा परिमितप्रमाता अन्तःकरण से युक्त हो जाता है, दिक्चरी शक्ति के द्वारा वह इन्द्रियों से युक्त होता है और भूचरी के द्वारा वह बाह्य पदार्थों को पृथक्-पृथक् रूप में देखता है । साधना के द्वारा खेचरी द्वारा पूर्णकर्तृत्व, गोचरी द्वारा अभेद का निश्चय, दिक्चरी द्वारा अभेद का प्रत्यक्ष, भूचरी के द्वारा प्रमेयों का अपने अंग के समान बोध उत्पन्न होता है । आणवोपाय निम्नलिखित है। साधना द्वारा जब उदान शक्ति और व्यान शक्ति विकसित होती है, तो जीव को तुर्य और तुर्यातीत दशा का अनुभव होता है और वह जीवन्मुक्त हो जाता है । सूत्र १३–पंचकृत्य के पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त ही अन्तर्मुखी भाव से चेतनपद पर पहुंच जाने ने चिति हो जाता है। जब पंचकृत्य का ज्ञान उदय होता है, तो अज्ञान निरस्त हो जाता है। चित्त अब अपनी शक्तियों से व्यामोहित नहीं होता और अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर चिति हो जाता है । सूत्र १४--चितिरूपी अग्नि अवरोह पद में (माया से) आच्छादित रहने पर भी प्रमेय रूपी इन्धन को कुछ अंश में जला देती है। यह शंका होती है कि यदि चिति का स्वभाव अभेद है तो व्यक्ति के पद में भेद की प्रतीति क्यों होती है ? इस सूत्र में इस शंका का उत्तर दिया गया है। व्यक्ति की अवस्था में भी चिति पूर्णतया अपने अभेद के स्वभाव को नहीं छोड़ती क्योंकि ज्ञात प्रमेयों को चिति उसी प्रकार आत्मसात् कर लेती है जैसे अग्नि इन्धन को अपने रूप में परिवर्तित कर लेती है। केवल माया से आच्छन्न होने के कारण चिति प्रमेयों को पूर्ण रूप से आत्मसात् नहीं कर पाती क्योंकि पूर्व संस्कारों के कारण वे पदार्थ पुनः उत्थापित हो जाते हैं। सूत्र १५–जब चिति अपने स्वभावसिद्ध बल को प्राप्त कर लेती है तब वह विश्व को आत्मसात् कर लेती है । यहां पर बल से तात्पर्य है अपने स्वरूप का उन्मेष । आत्मसात् करने का अर्थ है अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में आभासित करना । चिति-बल को