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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 54 of 187

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Page 54

४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्ति- पातोन्मिषित-पारमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषाम् ईश्वरप्रत्यभिज्ञोपदेशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते तत्र स्वात्मदेवताया एव सर्वत्र कारणत्वं सुखोपायप्राप्यत्वं महाफलत्वं च अभिव्यङ्क्तुमाह चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥१॥ ‘विश्वस्य’-सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य ‘सिद्धौ’-निष्पत्तौ, प्रका- शने, स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्ति- रूपा ‘चितिः’ भगवती ‘स्वतन्त्रा’-अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टा- रकाभिन्ना ‘हेतुः’-कारणम् । अस्यां हि प्रसरन्त्यां जगत् उन्मिषति व्यवतिष्ठते च, निवृत्तप्रसरायां च निमिषति;-इति स्वानुभव एव अनु०- इस संसार में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारमति के हैं (अर्थात् जिनकी मननशक्ति विकसित नहीं हुई है) जिन्होंने कठिन तर्कशास्त्र ११ में परिश्रम नहीं किया है, किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस समावेश १२ की अभिलाषा करते है जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके लिए ईश्वर- प्रत्यभिज्ञा १३ में जो उपदेश हैं उसके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है । स्वात्म रूपी देवता ही सब का कारण है, वही (परमार्थ की) प्राप्ति का सरल उपाय है, वही (जीवन का) उत्कृष्ट फल है—यह स्पष्ट करने के लिए कहते हैं :- सूत्र १४ १-(अनु०) स्वतंत्र १५ चिति १६ ही विश्व की सिद्धि का हेतु है। भाष्य :- विश्वस्य-अर्थात् सदाशिव १८ से लेकर भूमि तक विश्व के सिद्धौ-सिद्धि में अर्थात् प्रकाशन या सृष्टि में, स्थिति में और पर (सर्वोच्च) प्रमाता १९ (ज्ञाता) में-विश्रान्ति रूपी संहार में, परा (सर्वोच्च) शक्ति २० रूपा चिति जो स्वतंत्र है, जो उत्तम विमर्शमयी २१ है, जो शिवभट्टारक २२ से अभिन्न है, हेतु अर्थात् कारण है ।