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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्ति- पातोन्मिषित-पारमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषाम् ईश्वरप्रत्यभिज्ञोपदेशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते तत्र स्वात्मदेवताया एव सर्वत्र कारणत्वं सुखोपायप्राप्यत्वं महाफलत्वं च अभिव्यङ्क्तुमाह चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥१॥ ‘विश्वस्य’-सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य ‘सिद्धौ’-निष्पत्तौ, प्रका- शने, स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्ति- रूपा ‘चितिः’ भगवती ‘स्वतन्त्रा’-अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टा- रकाभिन्ना ‘हेतुः’-कारणम् । अस्यां हि प्रसरन्त्यां जगत् उन्मिषति व्यवतिष्ठते च, निवृत्तप्रसरायां च निमिषति;-इति स्वानुभव एव अनु०- इस संसार में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारमति के हैं (अर्थात् जिनकी मननशक्ति विकसित नहीं हुई है) जिन्होंने कठिन तर्कशास्त्र ११ में परिश्रम नहीं किया है, किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस समावेश १२ की अभिलाषा करते है जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके लिए ईश्वर- प्रत्यभिज्ञा १३ में जो उपदेश हैं उसके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है । स्वात्म रूपी देवता ही सब का कारण है, वही (परमार्थ की) प्राप्ति का सरल उपाय है, वही (जीवन का) उत्कृष्ट फल है—यह स्पष्ट करने के लिए कहते हैं :- सूत्र १४ १-(अनु०) स्वतंत्र १५ चिति १६ ही विश्व की सिद्धि का हेतु है। भाष्य :- विश्वस्य-अर्थात् सदाशिव १८ से लेकर भूमि तक विश्व के सिद्धौ-सिद्धि में अर्थात् प्रकाशन या सृष्टि में, स्थिति में और पर (सर्वोच्च) प्रमाता १९ (ज्ञाता) में-विश्रान्ति रूपी संहार में, परा (सर्वोच्च) शक्ति २० रूपा चिति जो स्वतंत्र है, जो उत्तम विमर्शमयी २१ है, जो शिवभट्टारक २२ से अभिन्न है, हेतु अर्थात् कारण है ।

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४५ अत्र साक्षी । अन्यस्य तु मायाप्रकृत्यादेः चित्प्रकाशभिन्नस्य अप्रकाश- मानत्वेन असत्त्वात् न क्वचिदपि हेतुत्वम्; प्रकाशमानत्वे तु प्रकाशै- कात्म्यात् प्रकाशरूपा चितिरेव हेतुः; न त्वसौ कश्चित् । अत एव देशकालाकारा एतत्स्सृष्टा एतदनुप्राणिताश्च नैतत्स्वरूपं भेत्तुमलम्;- इति व्यापक-नित्योदित-परिपूर्णरूपा इयम्-इत्यर्थलभ्यमेव एतत् । ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित्; अभेदे च कथं हेतुहेतुमद्भावः ? उच्यते । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति,-इत्येतावत्परमार्थोऽयं कार्यकार- रणभावः । यतश्च इयमेव प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेयमयस्य विश्वस्य इस पराचिति के ही प्रसरण से जगत् का अस्तित्व और स्थिति होती है इसका प्रसरण जब समाप्त हो जाता है तब जगत् का संहार हो जाता है । इसमें अपना अनुभव ही साक्षी है । अन्य किसी वस्तु का, माया, प्रकृति इत्यादि का जो चित्प्रकाश से भिन्न है, अतः अप्रकाशित होने के कारण जिसका अस्तित्व ही नहीं है, कभी भी विश्व की सिद्धि में कारणत्व नहीं हो सकता । यदि कहो कि माया, प्रकृति इत्यादि भी तो प्रकाशित है, तो वे प्रकाश से अभिन्न हो जायँगी । अतः प्रकाशरूपी चिति (विश्वसिद्धि में) हेतु है, न कि माया इत्यादि कोई वस्तु । अतएव देश, काल और आकार जिनकी सृष्टि इसी (चिति) से ही हुई है और जो इसी (चिति) से अनुप्राणित हैं इसके स्वरूप के भेदन करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि यह (चिति) व्यापक, नित्य उदित है और (अपने आप में) परिपूर्ण है । (सब सूत्र के) अर्थ से यही समझना चाहिए । यह शंका की जा सकती है (ननु) कि (यदि चित् ही सब कुछ है तब जगत् तो चित् से भिन्न होने के कारण कुछ नहीं है (अर्थात् इसका कोई अस्तित्व नहीं है) यदि (चित् और जगत् में) अभेद माना जाय, तो कार्य-कारण-भाव कैसे बन सकता है ? *

  • कार्य-कारण-भाव में कार्य कारण से भिन्न समझा जाता है । चित् जगत् का कारण माना गया है, किन्तु यदि चित् और जगत् में अभेद है, तो जगत् चित् का कार्य कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्य को तो कारण से भिन्न होना चाहिए ।
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४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय सिद्धौ-प्रकाशने हेतुः, ततोऽस्याः स्वतन्त्रापरिच्छिन्नस्वप्रकाशरूपायाः सिद्धौ अभिनवार्थप्रकाशनरूपं न प्रमाणवराकमुपयुक्तम् उपपन्नं वा। तदुक्तं त्रिकसारे 'स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते । पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथेयं बैन्दवी कला ॥' इति । यतश्च इयं विश्वस्य सिद्धौ पराद्वयसामरस्यापादनात्मनि च संहारे हेतुः, तत एव स्वतन्त्रा। प्रत्यभिज्ञातस्वातन्त्र्या सती, भोग- (उत्तर में कहा जाता है कि) स्वच्छ और स्वतंत्र होने के कारण भगवती चित् ही नाना प्रकार के अनन्त जगत् के रूप में उल्लसित होती है। कार्य कारण भाव यहाँ पर परमार्थ ❊ में प्रयुक्त हुआ है और केवल इतना ही उसका यहाँ तात्पर्य है। यतः चित् ही प्रमातृ २४-प्रमाण २५-प्रमेय २६-मय विश्व की सिद्धि अर्थात् प्रकाशन में हेतु है अतः इस स्वतंत्र अपरिच्छिन्न (असीम), स्वप्रका- शरूप चित् को सिद्ध करने में बेचारा प्रमाण जिसका नये नये अर्थों के प्रकाशन करने का स्वभाव है न तो उपयुक्त ही है, न उपपन्न ही † यह बात त्रिकसार में (इस प्रकार) कही गयी है । जैसे जब कोई अपने सिर की छाया को अपने पैर से लांघना चाहता है, तो सिर कभी भी पैर के स्थान पर नहीं होता, वैसे ही ( वैसा ही तथ्य ) इस वैन्दवी कला २७ (के विषय में है) यह (चिति) विश्व की सिद्धि में तथा परम अद्वय (चित्) से समरस २८ कर देने वाले संहार में भी हेतु है, इसलिए यह स्वतंत्र है २९ है। [यतः चिति विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों का हेतु है अतः वह स्वतंत्र है।] जब इसके स्वातन्त्र्य की पहचान हो जाती है, तो यह चित शक्ति भोगमोक्ष- ❊ परमार्थ में कार्य-कारण भाव में क्रम नहीं है। क्रम में ही कार्य कारण से भिन्न होता है। चित् का स्फुरण ही जगत् का उन्मेष है। दोनों का यौगपद्य (एक साथ होना) है। क्रम नहीं है। † कहने का तात्पर्य यह है कि प्रमाण का तो कार्य है किसी नये अर्थ को सिद्ध करना। जो सदा वर्तमान है उसे प्रमाण क्या सिद्ध करेगा ?

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४७ मोक्षस्वरूपाणां विश्वसिद्धीनां हेतुः ।-इति आवृत्त्या व्याख्येयम् । अपि च 'विश्वं'-नील-सुख-देह-प्राणादि; तस्य या 'सिद्धिः'- प्रमाणोपारोहक्रमेण विमर्शमयप्रमात्रावेशः, सैव 'हेतुः'-परिज्ञाने उपायो यस्याः । अनेन च सुखोपायत्वमुक्तम् । यदुक्तं श्रीविज्ञान- भट्टारके 'ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं संबन्धे सावधानता ॥' इति । 'चितिः'-इति एकवचनं देशकालाद्यनवच्छिन्नताम् अभिदधत् समस्तभेदवादानाम् अवास्तवतां व्यनक्ति । 'स्वतन्त्र'-शब्दो रूपी १० विश्वसिद्धि का भी हेतु होती है। इस दूसरे प्रकार से भी इसकी व्याख्या कर लेनी चाहिए । ( अब हेतु शब्द को उपाय के अर्थ में लेकर व्याख्या करते हैं ) विश्व का अर्थ नील (इत्यादि बाह्य पदार्थ), सुख (इत्यादि आन्तरिक संवेदन ), देह, प्राण ( इत्यादि परिमित प्रमाता ) उसकी जो सिद्धि अर्थात् प्रमाण के आरोहक्रम ११ से विमर्शमय प्रमाता में आवेश है, वही सिद्धि उस चिति शक्ति के पहिचान में हेतु अर्थात् उपाय है । उपाय यहां आसान उपाय के अर्थ में कहा गया है जैसा कि श्री विज्ञानभट्टारक में कहा गया है । (विज्ञान भैरव श्लोक १०६ ) “ज्ञेय और ज्ञाता का ज्ञान सभी देहधारियों के लिए सामान्य है, किन्तु योगियों की विशेषता यह है कि वह इस संबंध के विषय में सजग रहता है ।” ( अर्थात् वह यह समझता है कि ग्राह्य या ज्ञेय सर्वदा ग्राहक या ज्ञाता से सम्बद्ध रहता है । बिना ज्ञाता से सम्बद्ध हुए कोई ज्ञेय हो ही नहीं सकता जहां से ज्ञाता का उदय होता है और जिसमें उसकी विश्रान्ति होती है उसका योगी को सदा भान रहता है ) (सूत्र में) चिति जो एकवचन में है यह बतलाते हुए कि वह देश, काल इत्यादि से परिसीमित नहीं है समस्त भेदवादों की अवास्तविकता को व्यक्त करती है ।

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४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय ब्रह्मवादवैलक्षण्यम् आचक्षाणः चितो माहैश्वर्यसारतां ब्रूते । ‘विश्व’- इत्यादिपदम् अशेषशक्तित्वं, सर्वकारणत्वं, सुखोपायत्वं महाफलं च आह ॥ १ ॥ ननु विश्वस्य यदि चितिः हेतुः, तत् अस्या उपादानाद्यपेक्षायां भेदवादापरित्यागः स्यात्-इत्याशङ्क्य आह स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥ ‘स्वेच्छया’ न तु ब्रह्मादिवत् अन्येच्छया तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया,-एवं हि प्रागुक्तस्वातन्त्र्यहान्या चित्त्वमेव न घटेत-‘स्व भित्तौ’, न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं ‘विश्वं’ दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव ‘उन्मीलयति’ । उन्मीलनं च अव- (सूत्र में) स्वतंत्र शब्द ब्रह्मवाद३२ से विलक्षणता बतलाते हुए यह भी बतलाता है कि चित् का सार है महान् ऐश्वर्य । (सूत्र में) विश्व इत्यादि पद यह बतलाते हैं कि चिति की शक्ति अपरि- सीमित है, वही सबका कारण है, वही (उसी का परिज्ञान) (मोक्ष का) सरल उपाय है, और वही जीवन का परम फल है । यहाँ यह शंका उठती है (ननु) कि यदि चिति विश्व सिद्धि का हेतु है तो उसको उपादान इत्यादि की आवश्यकता होने से भेदवाद का परित्याग नहीं हो सकता । ऐसी शंका करके (उत्तर में) कहते हैं । सूत्र २-(अनुवाद) अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति (आधार) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है । भाष्य (अनु०) स्वेच्छया अपनी ही इच्छा से, दूसरे (मायाइ०) की इच्छा से नहीं जैसा कि ब्रह्मवादी (वेदान्ती) मानता है, उसी (इच्छा ही) के द्वारा, न कि उपादान (वस्तु तैयार करने की सामग्री) आदि के भरोसे । ऐसा होने पर (अर्थात् उपादान कारण आदि के भरोसा करने पर) पहले कहे हुए (प्रथम सूत्र में कहे हुए) स्वातंत्र्य के अभावके कारण उसका चित् होना ही (चित्त्वं) नहीं सम्भव हो सकता (अर्थात् चित् और स्वातंत्र्य अवियोज्य हैं ।) 'स्वभित्तौ' अपनी ही भित्ति पर, अपने ही आधार पर और कहीं नहीं । पहले (प्रथम सूत्र में) निश्चित रूप से बतलाये हुए विश्व को दर्पण में नगर के समान अभिन्न होते हुए भी भिन्न के समान व्यक्त करती है ।३३

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४६ स्थितस्यैव प्रकटीकरणम् ।-इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्था- नम् उक्तम् ॥ २ ॥ अथ विश्वस्य स्वरूपं विभागेन प्रतिपादयितुमाह । तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् ॥ ३ ॥ 'तत्' विश्वं 'नाना'-अनेकप्रकारम् । कथं ? 'अनुरूपाणां'- परस्परोचित्यावस्थितीनां 'ग्राह्याणां ग्राहकाणां' च 'भेदात्'-वैचि- त्र्यात् । तथा च सदाशिवतत्त्वे अहन्ताच्छादित-अस्फुटेदन्तामयं यादृशं परापररूपं विश्वं ग्राह्यं, तादृगेव श्रीसदाशिवभट्टारकाधिष्ठितो मन्त्र- महेश्वराख्यः प्रमातृवर्गः परमेश्वरेच्छावकल्पिततथावस्थानः । ईश्वर- सूत्र में जो उन्मीलन शब्द आया है वह (चिति में पहले से ही अव्यक्त रूप में) जो स्थित है उसको प्रकट या व्यक्त करने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । इस सूत्र से जगत् का (सृष्टि से पूर्व) प्रकाश रूप में ही स्थित रहना बतलाया गया है । अब विश्व का स्वरूप विभाग द्वारा स्पष्ट करने के लिए कहते हैं । सूत्र ३—विश्व (परस्पर) अनुरूप ग्राह्य (प्रमेय) और ग्राहक (प्रमाता) के भेद से नाना प्रकार का है । भाष्य—(सूत्र में जो) 'तत्' (वह) शब्द है, वह विश्व के लिए प्रयुक्त है । जो 'नाना' शब्द है वह 'अनेक प्रकार' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । कैसे ? परस्पर उपयुक्त रूप में स्थित ग्राह्य (प्रमेय) और गाहक (प्रमाता) के भेद अर्थात् वैचित्र्य से । (ग्राह्य और ग्राहक की अनुरूपता निम्नलिखित है) सदाशिवतत्त्व में जिस प्रकार परापर रूप विश्व जो कि 'मैं' के भाव (अहन्ता) से आच्छादित है और जिसमें 'इस' का भाव (इदन्ता) अस्फुट है ग्राह्य (प्रमेय या विषय) है उसी के अनुरूप मंत्रमहेश्वर नाम के (वहाँ) प्रमाता भी हैं जिनके अधिष्ठाता पूज्य सदा शिव हैं और जिनकी उस दशा में स्थिति परमेश्वर की इच्छा से होती है ।

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५० प्रत्यभिज्ञाहृदय तत्त्वे स्फुटेदन्ताहन्तासामानाधिकरण्यात्म यादृक् विश्वं ग्राह्यं, तथाविध एव ईश्वरभट्टारकाधिष्ठितो मन्त्रेश्वरवर्गः । विद्यापदे श्रीमदनन्तभट्टार- काधिष्ठिता बहुशाखावान्तरभेदभिन्ना यथाभूता मन्त्राः प्रमातारः, तथाभूतमेव भेदैकसारं विश्वमपि प्रमेयम् । मायोध्वे यादृशा विज्ञाना- कलाः कर्तृताशून्यशुद्धबोधात्मानः, तादृगेव तदभेदसारं सकल-प्रलया- कलात्मक-पूर्वावस्थापरिमितम् एषां प्रमेयम् । मायायां शून्यप्रमातृणां प्रलयकेवलिनां स्वोचितं प्रलीनकलं प्रमेयम् । क्षितिपर्यन्तावस्थितानां तु सकलानां सर्वतो भिन्नानां परिमितानां तथाभूतमेव प्रमेयम् । तदुत्तीर्णशिवभट्टारकस्य प्रकाशैकवपुषः प्रकाशैकरूपा एव भावाः । ईश्वर तत्व³⁷ में जिस प्रकार का विश्व ग्राह्य या विषय है जिसमें कि 'मैं' (अहन्ता) और 'यह' (इदन्ता) समान रूप से स्फुट या स्पष्ट हैं उसी प्रकार उसमें मन्त्रेश्वर वर्ग ग्राहक या प्रमाता है (जिसको 'मैं' और 'यह' एक साथ समान रूप से स्पष्ट है) । उस मंत्रेश्वर वर्ग का अधिष्ठाता पूज्य ईश्वर है । विद्या अर्थात् शुद्ध विद्या पद में जैसे भिन्न-भिन्न 'मंत्र' प्रमाता (ज्ञाता) होते हैं वैसे ही उनके द्वारा प्रमेय (ज्ञेय) विश्व भी ऐसा है जिसका भेद ही एक सार है । इन मंत्रों की बहुत सी शाखाएँ हैं और वे अन्यान्य भेद के कारण परस्पर भिन्न हैं । उनका अधिष्ठाता अनन्त भट्टारक है । माया से ऊपर (और शुद्ध विद्या से नीचे) जिस प्रकार विज्ञानाकल प्रमाता हैं जो कर्तृता से शून्य हैं और शुद्ध बोधरूप हैं उसी प्रकार उनसे अभिन्न और पूर्व अवस्था में परिचित सकल और प्रलयाकल उनके प्रमेय हैं । माया के स्तर पर शून्य प्रमाता या प्रलयकेवली³⁸ होते हैं जिनका प्रमेय अर्थात् ज्ञेय विषय शून्यप्राय होता है जो कि उनकी दशा के लिए उचित ही है । (प्रलयाकल के अनन्तर) (माया से लेकर) पृथ्वो तक सकल³⁹ अवस्थित हैं जो कि परिमित होते हैं और सबसे भिन्न होते हैं । जैसे ये परि- मित और भिन्न होते हैं वैसे ही ( तथाभूतम् ) इनका प्रमेय भी परिमित और भिन्न होता है । इन सबसे (अर्थात् मंत्रमहेश्वर से लेकर सकल तक जो प्रमाता हैं) परे शिव भट्टारक (पूज्य, आदरणीयशिव) है जो कि केवल प्रकाशरूप⁴⁰ है और जिसकी सभी अवस्थाएँ भी प्रकाशरूप ही हैं। श्रीमत्परमशिव की

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ५१ श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक-परमानन्दमय-प्रकाशैक- घनस्य एवंविधमेव शिवाद‌ि-धरण्यन्तम् अखिलम् अभेदेनैव स्फुरति ; न तु वस्तुतः अन्यत् किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वा ; अपि तु श्रीपरम- शिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति-इत्यभिहित- प्रायम् ॥ ३ ॥ यथा च भगवान् विश्वशरीरः, तथा चितिसंकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचितविश्वमयः ॥४॥ श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं सदाशिवायुचितेन रूपेण अवविभासयिषुः पूर्वं चिदैक्याख्यातिमयानाश्रितशिवपर्याय- शून्यातिशून्यात्मतया प्रकाशाभेदेन प्रकाशमानतया स्फुरति ; ततः चिद्रसाश्यानतारूपाशेषतत्त्वभुवन भाव-तत्तत्प्रमात्राद्यात्मतयाऽपि प्रथते । यथा च एवं भगवान् विश्वशरीरः, तथा 'चितिसंकोचात्मा' संकुचित- अवस्था में जो कि विश्व से परे है और विश्वमय भी है, जो परमानन्दरूप है, जो सघन प्रकाश है, सब कुछ—शिव से लेकर पृथिवी तक अभेदरूप से ही प्रकाशित होता रहता है । वस्तुतः अन्य कोई ग्राह्य-ग्राहक है ही नहीं । पूज्य (भट्टारक) परमशिव ही इस प्रकार सहस्त्रों भिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है । यही इस सूत्र के कहने का तात्पर्य है । जैसे भगवान् का समस्त विश्व शरीर रूप ही है, वैसे ही सूत्र ४—वह चेतन भी (व्यष्टि, चेतन व्यक्ति भी) जिसमें चिति संकुचित हो गई है, संकुचित रूप में विश्वमय ही है । [ अर्थात् जैसे समष्टिचेतन अथवा परमशिव से विश्व अभिन्न है विश्व उसका शरीर रूप ही है, उसी प्रकार व्यष्टिचेतन अर्थात् व्यक्ति भी विश्वमय है । अन्तर यह है कि व्यष्टिचेतन में चिति संकुचित रहती है । इसलिए उसका विश्व भी संकुचित रहता हैं । परमशिव का समस्त विश्व शरीर है । व्यक्तिचेतन का विश्व पाँच-छः फीट वाला शरीर है । ] भाष्य—श्री परमशिव, विश्व को, जो कि तादात्म्यरूप में उनमें स्थित है, सदाशिव आदि उपयुक्त रूप से प्रकाशित करने की इच्छा रखते हुए, पहले प्रकाश से अभिन्न रूप में अर्थात् प्रकाश के ही रूप में प्रकाशित होते हैं । इस अवस्था में चिदैक्य की (चिदेकता की वह अवस्था जिसमें चित् ओर विश्व

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चिद्रूपः, 'चेतनो' ग्राहकोऽपि वटधानिकावत् संकुचिताशेषविश्वरूपः । तथा च सिद्धान्तवचनम् । 'विग्रहो विग्रही चैव सर्वविग्रहविग्रही ।' इति । त्रिशिरोमतेऽपि 'सर्वदेवमयः कायस्तं चेदानीं शृणु प्रिये । पृथिवी कठिनत्वेन द्रवत्वेऽम्भः प्रकीर्तितम् ।।' इत्युपक्रम्य 'त्रिशिरोभैरवः साक्षाद्व्याप्य विश्वं व्यवस्थितः ।।' इत्यन्तेन ग्रन्थेन ग्राहकस्य संकुचितविश्वमयत्वमेव व्याहरति । एक रूप है) अख्याति* (बोध से हट जाना) हो जाती है। इस अवस्था का अनाश्रित शिव ४१ पर्याय (दूसरा नाम) है जिसमें शून्य से भी अधिक शून्य ४२ रहता है। (अर्थात् विश्व का अभाव (शून्य) सा हो जाता है, केवल प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है) । इसके अनन्तर वह सब तत्त्व, भुवन, भाव (पदार्थ) और इनके प्रमाताओं (ज्ञाताओं) के रूप में भी प्रकाशित होता है। ये सब चिद्रस के घनीभूत रूप हैं (चिद्रसाश्यानतारूप) और जैसे इस प्रकार भगवान् का सम्पूर्ण विश्व शरीर है, वैसे ही उस चेतन अर्थात् ग्राहक या प्रमाता का-जिसका चित् संकुचित हो गया है (चितिसंकोचात्मा) संकुचित रूप में समस्त विश्व शरीर है जिस प्रकार वट वृक्ष (संकुचित रूप में) अपने बीज में रहता है । (इस शास्त्र का) सिद्धान्त वचन भी है। “एक शरीर और शरीरी में सब शरीर और शरीरियों का अन्तर्भाव है।" त्रिशिरोमत ४३ में भी "यह शरीर सभी देवों ४४ का रूप है। हे प्रिये ४५ इसके विषय में सुनो। काठिन्य के कारण यह पृथ्वी कहलाता है और द्रवत्व के कारण जल।" इस प्रकार प्रारम्भ करके तीन शिर वाला भैरव ४६ विश्व में व्याप्त होकर साक्षात् व्यवस्थित है। अन्त में इस प्रकार कहकर यही बतलाया है कि (संकुचित) ग्राहक या प्रमाता संकुचित रूप में विश्वमय ही है।

  • 'अख्याति' का अर्थ है "शिवस्वरूपापोहनम्" अर्थात् वह स्थिति जिसमें शिव का पूर्ण स्वरूप ओझल हो जाता है, शिव का पूर्ण स्वरूप वह है जिसमें शिव और विश्व का एकीभाव है, इसी को 'चिदैक्य' कहा है। विश्व का निषेध हो जाना 'चिदैक्य की अख्याति' है। इस अख्यातिमय अवस्था का दूसरा नाम 'अनाश्रित शिव' है।
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प्रत्यभिज्ञाहृदय ५३ अयं च अत्राशयः--ग्राहकोऽपि अयं प्रकाशैकात्म्येन उक्तागम- युक्त्या च विश्वशरीरशिवैकरूप एव, केवलं तन्मायाशक्त्या अन- भिव्यक्तस्वरूपत्वात् संकुचित इव आभाति; संकोचोऽपि विचार्यमाणः चिदैकात्म्येन प्रथमानत्वात् चिन्मय एव, अन्यथा तु न किंचित् ।-इति सर्वो ग्राहको विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव । तदुक्तं मयैव 'अख्यातिर्यदि न ख्याति ख्यातिरेवावशिष्यते । ख्याति चेत् ख्यातिरूपत्वात् ख्यातिरेवावशिष्यते ॥' इति । अनेनैव आशयेन श्रीस्पन्दशास्त्रेषु 'यस्मात्सर्वमयो जीवः.........।' इत्युपक्रम्य 'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ॥' (इस कथन का) यहाँ यह अभिप्राय है- ग्राहक या प्रमाता उस शिव से जिसका विश्व शरीर है अभिन्न है क्योंकि ग्राहक (शिवके समान) प्रकाश स्वरूप है और क्योंकि पूर्वोक्त आगम ने (इसके लिए) युक्ति (तर्क) भी दी है। केवल उसकी (शिव की) माया शक्ति के कारण वह (ग्राहक) अपने स्वरूप के अभिव्यक्त न होने के कारण संकुचित जैसा लगता है। विचार करने पर (यह स्पष्ट हो जायगा) कि संकोच भी चिन्मय अर्थात् चिद्रूप होने के कारण ही वह प्रथमान अर्थात् प्रकाशित होता है, नहीं तो संकोच कुछ भी नहीं रह जायगा। (अर्थात् यदि संकोच प्रकाशित नहीं होता, तो वह कुछ नहीं है; यदि प्रकाशित होता है तो वह चिद्रूप ही हैं) इस प्रकार सभी ग्राहक वह पूज्य शिव ही हैं जिसका विश्व शरीर है। यह मैंने ही (अन्यत्र) कहा है। 'यदि यह कहा जाय कि अख्याति (अज्ञान) वह है जो प्रकाशित नहीं होती तो फिर ख्याति (ज्ञान) ही बच रहती है (क्योंकि जो प्रकाशित ही नहीं होता वह कुछ नहीं है)। यदि यह कहा जाय कि अख्याति प्रकाशित होती है तब तो (और भी) ख्यातिरूप होने के कारण (अर्थात् प्रकाशित होने के कारण) ख्याति ही बच रहती है। (अर्थात् ख्याति (ज्ञान) जो चिद्रूप है वही सब कुछ है। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।) इसी आशय

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इत्यादिना शिवजीवयोरभेद एव उक्तः । एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः, एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव च बन्धः;-इति भविष्यति एव एतत् ॥ ४ ॥ ननु ग्राहकोऽयं विकल्पमयः, विकल्पनं च चित्तहेतुकं; सति च चित्ते, कथमस्य शिवात्मकत्वम् ?-इति शङ्कित्वा चित्तमेव निर्णेतुमाह चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् ॥५॥ न चित्तं नाम अन्यत् किंचित्, अपि तु सैव भगवती तत् । तथा हि सा स्वं स्वरूपं गोपयित्वा यदा संकोचं गृह्णाति, तदा द्वयी गतिः ; कदाचित् उल्लसितमपि संकोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति, कदाचित् संकोचप्रधानतया । चित्प्राधान्यपक्षे सहजे, प्रकाशमात्र- प्रधानत्वे विज्ञानाकलता; प्रकाशपरामर्शप्रधानत्वे तु विद्याप्रमा- से स्पन्दशास्त्र में “क्यों कि जीव विश्वमय है (अर्थात् विश्व से अभिन्न है) यहां से प्रारम्भ करके, “इस कारण चाहे शब्द हो, चाहे अर्थ हो, चाहे चिन्तन हो- कोई भी ऐसी अवस्था नहीं है जो शिव नहीं है”४८ इससे उपसंहार करते हुए शिव और जीव का अभेद ही कहा है । इसी तत्त्व का ज्ञान मुक्ति हैं, इसी तत्त्व का अज्ञान बन्धन है । यह बात आगे स्पष्ट होगी ही ॥४॥ यहां एक प्रश्न उठता है--ग्राहक (ज्ञाता) विकल्पमय ४९ है, विकल्प की क्रिया चित्त के कारण होती है, तो चित्त के रहते हुए ज्ञाता शिवरूप कैसे हो सकता है (क्योंकि शिव तो निर्विकल्प है) । ऐसी शंका करके चित्त का ही निश्चित रूप बतलाने के लिए कहते हैं । सूत्र ५-चिति (परा संविद्, समष्टि संविद्) ही चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर का चित्त (व्यष्टिगत संविद्) बन जाती है क्योंकि चेत्य (चेतनाद्वाराग्राह्यपदार्थ) के अनुकूल वह संकुचित हो जाती है । भाष्य-चित्त और कुछ नहीं है; चिति ही चित्त है । जब वह अपने स्वरूप को छिपाकर संकोच ग्रहण करती है, तो दो गति होती है- कभी जो संकोच प्रारम्भ हो रहा है उसे गौण करके चित् की प्रधानता के रूप में प्रका- शित होती है, कभी संकोच की प्रधानता के रूप में (प्रकाशित होती है) । जब चित् की प्रधानता स्वाभाविक रूप में प्रकट होती है, तो प्रकाशमात्र (अर्थात्- विमर्श रहित) प्रधान होने पर विज्ञानाकल ५० की अवस्था होती है और

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ५५ वृता। तत्रापि क्रमेण संकोचस्य तनुतायाम्, ईश-सदाशिवानाश्रित- रूपता। समाधिप्रयत्नोपाजिते तु चित्प्रधानत्वे शुद्धाध्वप्रमातृता क्रमात्क्रमं प्रकर्षवती। संकोचप्राधान्ये तु शून्यादिप्रमातृता। एवमव- स्थिते सति, 'चितिरेव' संकुचितग्राहकरूपा 'चेतनपदात् अवरूढा'-- अर्थग्रहणोन्मुखी सती 'वेत्येन'-नील-सुखादिना 'संकोचिनी' उभय- संकोचसंकुचितैव चित्तम्। तथा च 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या। मायात्तृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥' परामर्श (विमर्श) सहित प्रकाश के प्रधान होने पर विद्या-प्रमाता ५१ की अवस्था होती है। इस स्थिति में भी (अर्थात् विमर्शसहित प्रकाश की अव- स्थामें) क्रम से संकोच के कम होने पर ईश, सदाशिव और अनाश्रित शिव ५२ की दशा प्राप्त होती है। समाधि के प्रयत्न से प्राप्त किये हुए चित् के प्रधानत्व में, शुद्धाध्व ५३ का प्रमाता क्रमशः सर्वोच्च स्थिति में पहुँचता है। ❊ (चित् के) संकोच की प्रधानता होने पर शून्यादिप्रमाता होते हैं। इस प्रकार से स्थित होने पर चिति ही (चैतन्य स्वरूप ही) संकुचित (परिमित) प्रमाता के रूप में चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर कर विषयों को ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त होकर चेत्य अर्थात् ग्राह्य या प्रमेयों- जैसे नील (बाह्यप्रमेय) सुख (आन्तर प्रमेय) इत्यादि से संकुचित होकर, दो संकोचों (बाह्य और आन्तर प्रमेय) से संकुचित होकर चित्त बन जाती है। (चिति ही, समष्टि चेतना ही संकोच के कारण, परिच्छिन्न होकर चित्त अर्थात् व्यष्टिचेतना बन जाती है)। ❊ इसका भाव यह है कि चित् की प्रधानता या तो सहज रूप में होती हैं या समाधि के प्रयत्न से अर्जित होती है। सहज रूप में जो चित् की प्रधा- नता होती है उसमें या तो प्रकाशमात्र की प्रधानता हो सकती है या विमर्श सहित प्रकाश की प्रधानता हो सकती है। प्रकाशमात्र की प्रधानता का प्रमाता विज्ञानाकल है, विमर्श सहित प्रकाश की प्रधानता के प्रमाता विद्या-प्रमाता (शुद्धविद्याप्रमाता) हैं। समाधि के प्रयत्न द्वारा अर्जित चित् की प्रधानता के प्रमाता शुद्धाध्वप्रमाता होते हैं जो क्रमशः सर्वोच्च अवस्थातक पहुँच जाते हैं।

२. द्वितीय भाग (सूत्र ७-१२): आणव, मायीय, कार्म मल एवं पञ्चकृत्य-विधान

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५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय इत्यादिना स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रिया-मायाशक्ति- रूपा पशुदशायां संकोचप्रकर्षात् सत्त्व-रजस्तमःस्वभावचित्तात्मतया स्फुरति; इति श्रीप्रत्यभिज्ञायामुक्तम् । अत एव श्रीतत्त्वगर्भस्तोत्रे विकल्पदशायामपि तात्त्विकस्वरूपसद्भावात् तदनुसरणाभिप्रायेण उक्तम् 'अत एव तु ये केचित्परमार्थानुसारिणः । तेषां तत्र स्वरूपस्य स्वज्योतिष्ट्वं न लुप्यते ॥' इति ॥ ५ ॥ चित्तमेव तु मायाप्रमातुः स्वरूपम्-इत्याह तन्मयो मायाप्रमाता ॥ ६ ॥ इसी प्रकार श्री प्रत्यभिज्ञा (उत्पलदेव की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा १.४.३) में कहा है—पति (शिव) की जो ज्ञान, क्रिया और तीसरी माया शक्तियाँ हैं वे ही अपने अंगरूप पदार्थों के विषय में पशुदशा में (अणुमें, जीव में) क्रमशः सत्त्व, रजस् और तमस् बन जाती हैं। इससे और इसी प्रकार की अन्य उक्तियों से (यह स्पष्ट है कि) चिति शक्ति ही जिसका स्वातंत्र्य स्वरूप है, जो ज्ञान, क्रिया और माया शक्ति रूप ५५ है पशु (जीव) की दशा में संकोच के बढ़ जाने के कारण सत्व, रज और तम् ५६ के स्वभाव वाले चित्त के रूप में प्रकट होती है। विकल्पदशा ५७ में भी जीव अर्थात् व्यष्टि की अन्तश्चेतना तात्त्विक स्वरूप में ही रहती है इसीलिए उसके (तात्त्विक स्वरूप के) अनु- सरण के अभिप्राय से श्री गर्भस्तोत्र में कहा है :- अतएव जो कोई परमार्थ का अनुसरण करते हैं उनके लिए स्वरूप के (अर्थात् आत्मा के वास्तविक स्वभाव का) स्वप्रकाशत्व का लोप नहीं होता। चित्त ही मायाप्रमाता का स्वरूप है, इसलिए कहते हैं। सूत्र ६—तन्मयोमायाप्रमाता ॥ ६ ॥ अर्थात् मायाप्रमाता ५८ तत् (चित्त) मय होता है। (माया से आवृत्त जो अणु है वह चित्त-प्रधान है)।

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ५७ देहप्राणपदं तावत् चित्तप्रधानमेव; शून्यभूमिरपि चित्तसंस्कार- वत्येव; अन्यथा ततो व्युत्थितस्य स्वकर्तव्यानुधावनाभावः स्यात्;- इति चित्तमय एव मायीयः प्रमाता। अमुनैव आशयेन शिवसूत्रेषु वस्तुवृत्तानुसारेण 'चैतन्यमात्मा' (१-१) इत्यभिधाय, मायाप्रमातृलक्षणावसरे पुनः 'चित्तमात्मा' (३-१) इत्युक्तम् ॥६॥ अस्यैव सम्यक् स्वरूपज्ञानात् यतो मुक्तिः, असम्यक् तु संसारः, ततः तिलश एतत्स्वरूपं निर्भङ्क्तुमाह भाष्य—देह और प्राण के क्षेत्र में चित्त प्रधान है ही, शून्य-भूमि में भी (अर्थात् जिस अवस्था में केवल शून्य का ही भान होता है) उसमें भी चित्त का संस्कार रहता हैं। नहीं तो शून्य के अनुभव के बाद व्युत्थानदशा में आने में अपने कर्त्तव्य का अनुसरण सम्भव न होता (अर्थात् शून्य के अनुभव की अवस्था में यदि चित्त का संस्कार न बना रहता, यदि उस दशा में चित्त निर्मूल हो जाता तो शून्य के अनुभव से उठने के बाद फिर अपने कर्त्तव्य का ही पता न लगता। शून्य दशा में भी यद्यपि चित्त क्रियाशील नहीं रहता तथापि उसके संस्कार वर्तमान रहते हैं। उन्हीं संस्कारों के कारण ही हम शून्य के अनुभव की अवस्था से फिर व्यवहार दशा में आने पर अपने कार्यों के सूत्र को पकड़ लेते हैं)। इसलिए मायायुक्त प्रमाता चित्तमय ही है। इसी आशय से शिवसूत्रों में वस्तुस्थिति को बतलाने के समय चैतन्यमात्मा (अर्थात् चैतन्य ही—समष्टि चित्—ही आत्मा है (१-१) यह कहकर माया प्रमाता के लक्षण को बतलाने के समय चित्तमात्मा (३०१) यह कहा है। (अर्थात् माया प्रमाता की दृष्टि से चित्त—व्यष्टि चेतना—ही आत्मा है) ॥ ६ ॥ यतः इसी (आत्मा) के स्वरूप के सम्यक् ज्ञान से मुक्ति होती है और असम्यक् ज्ञान से संसरण (नाना योनियों में भ्रमण) होता है, अतः उनके स्वरूप का एक एक करके विश्लेषण करने के अभिप्राय से कहते हैं—

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५८ प्रत्यभिज्ञाहृदय स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्तपञ्चकस्वभावः ॥ ७ ॥ निर्णीतदृशा चिदात्मा शिवभट्टारक एव 'एक' आत्मा, न तु अन्यः कश्चित्; प्रकाशस्य देशकालादिभिः भेदायोगात्; जडस्य तु ग्राहकत्वानुपपत्तेः । प्रकाश एव यतः स्वातन्त्र्यात् गृहीतप्राणादि- संकोचः संकुचितार्थग्राहकतामश्नुते, ततः असौ प्रकाशरूपत्व- संकोचावभासवत्त्वाभ्यां 'द्विरूपः' । आणव-मायीय-कार्ममलावृतत्वात् 'त्रिमयः' । शून्य-प्राण-पुर्यष्टकशरीरस्वभावत्वात् 'चतुरात्मा' । सूत्र ७-और यद्यपि वह (आत्मा) एक है तथापि द्विरूप, त्रिमय चतुर्मय और सात पंचक स्वभाव वाला है ॥७॥ भाष्य-जैसा पहले निर्णय किया जा चुका है उस दृष्टि से चित् रूपी भगवान् शिव एक आत्मा है, दूसरा कोई नहीं । क्योंकि प्रकाश (प्रकाश रूप आत्मा ) का देश, काल आदि द्वारा भेद नहीं किया जा सकता; जड़ का तो ग्राहकत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता ।* यतः प्रकाश ही अपने स्वातंत्र्य५९ से प्राण इत्यादि संकोच को धारण कर लेता है और संकुचित अर्थों ( विषयों ) का ग्राहक ( ज्ञाता ) बनता है अतः वह (१) प्रकाश रूप और (२) संकुचित अवभास रूप के कारण द्विरूप ( दो रूप वाला ) बन जाता है । आणव, मायीय और कार्म मल६० से आवृत अर्थात् आच्छादित होने के कारण वह त्रिमय ( तीन प्रकार वाला ) भी कहलाता है । वह (१) शून्य६१ (२) प्राण (३) पुर्यष्टक६२ (४) और ( स्थूल ) शरीर का स्वभाव ग्रहण करता है । इस लिए वह चतुरात्मा कहलाता है ।

  • कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा चित् स्वरूप है । चित् सर्वदा प्रकाश स्वरूप है । भेद देश, काल आदि के द्वारा होता है। प्रकाश का देश, काल आदि के द्वारा भेद नहीं किया जा सकता । प्रकाश सर्वदा सर्वथा प्रकाश ही रहता है । अतः प्रकाश एक है। आत्मा प्रकाश स्वरूप है, अतः आत्मा एक है । और जड़ तो ग्राहक बन ही नहीं सकता; वह तो केवल ग्राह्य ही रहता है ।
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'सप्तपञ्चकानि'-शिवादिपृथिव्यन्तानि पञ्चत्रिंशत्तत्त्वानि 'तत्स्व- भावः'। तथा शिवादि-सकलान्त-प्रमातृसप्तकस्वरूपः; चिदा- नन्देच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तिरूपत्वेऽपि अख्यातिवशात् कला-विद्या-राग- काल-नियतिकञ्चुकवलितत्वात् पञ्चकस्वरूपः । एवं च शिवैकरू- पत्वेन, पञ्चत्रिंशत्तत्त्वमयत्वेन, प्रमातृसप्तकस्वभावत्वेन चिदादिशक्ति- पञ्चकात्मकत्वेन च अयं प्रत्यभिज्ञायमानो मुक्तिदः; अन्यथा तु संसार- हेतुः ॥ ७ ॥ एवं च तद्भूूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः ॥ ८ ॥ सप्त पंचक यह शब्द जो सूत्र में आया है उसे दो प्रकार से समझ सकते हैं ) ( पहला प्रकार वह है जिसमें सप्त और पंचक को एक साथ लेकर समझें ) आत्मा का सात पंचक वाला स्वभाव है । अर्थात् शिव से लेकर पृथिवी तक वह (७ × ५) ३५ तत्वों के स्वभाव वाला है । ( दूसरा प्रकार वह है जिसमें सप्त और पंचक को अलग-अलग लेकर समझें) । वह (आत्मा) शिव से लेकर सकल तक सात प्रमाताओं के स्वरूप वाला है । * यद्यपि वह (आत्मा) १-चित्, २-आनन्द, ३-इच्छा, ४-ज्ञान, ५-क्रिया- स्वरूप वाला है तथापि अख्याति (अज्ञान) वश वह १-कला, २-विद्या, ३-राग, ४-काल, ५-नियति, कंचुकों ६१ (आवरणों) से ग्रस्त हो जाने के कारण (ढक जाने के कारण) पांच स्वरूप वाला (जीव) हो जाता हैं । इस प्रकार पैंतीस तत्त्वमय के रूप में, सात प्रमाताओं के स्वभाव में, चित् इत्यादि पाँच शक्तियों के रूप में जब यह भली भांति पहचान लिया जाता है कि यह एक शिव ही है तब यह ज्ञान मुक्तिदायक होता है । नहीं तो (इनका भिन्न- भिन्न रूप ज्ञान) संसरण (जन्म-मरण) का कारण होता है । और इस प्रकार सूत्र ८-सब दर्शनों की स्थितियाँ उसकी ( आत्मा की ) भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ हैं ।

  • वे सात प्रमाता इस प्रकार है :--शिव प्रमाता, २-मन्त्र महेश्वर, ३-मन्त्रेश्वर, ४-मन्त्र, ५-विज्ञानाकल, ६-प्रलयाकल, ७-सकल ।
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६० प्रत्यभिज्ञाहृदय 'सर्वेषां चार्वाकादिदर्शनानां 'स्थितयः'-सिद्धान्ताः 'तस्य' एतस्य आत्मनो नटस्येव स्वेच्छावगृहीताः कृत्रिमा 'भूमिकाः' । तथा च 'चैतन्यविशिष्टं शरीरमात्मा ।' इति चार्वाकाः नैयायिकादयो ज्ञानादिगुणगणाश्रयं बुद्धितत्त्वप्रायमेव आत्मानं संसृतौ मन्यन्ते, अपवर्गे तु तदुच्छेदे शून्यप्रायम् । अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिः तिरस्कृतः आत्मा-इति मन्वाना मीमांसा अपि बुद्धावेव निविष्टाः । ज्ञानसंतान एव तत्त्वम्-इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः । प्राण एव आत्मा-इति केचित् श्रुत्यन्तविदः । भाष्य :--सर्वदर्शन स्थितयः सर्वेषां दर्शनानां स्थितयः । अर्थात् सब दर्शनों-चार्वाक आदि दर्शनों की स्थितियां । स्थितियां का अर्थ है सिद्धान्त तद्भूमिकाः--तस्य भूमिकाः अर्थात् उस (आत्मा) की नट के समान अपनी इच्छा से गृहीत कृत्रिम भूमिकाएँ । पूरे सूत्र का तात्पर्य है-- सभी दर्शनों के सिद्धांत आत्मा की नट के समान अपनी इच्छा से गृहीत कृत्रिम भूमिकाएँ हैं । चार्वाक मतानुयायी कहते हैं-चैतन्य से विशिष्ट शरीर ही आत्मा है । नैयायिक (न्याय दर्शन के सिद्धान्त को माननेवाले) इत्यादि❊ संसार दशा में ज्ञान इत्यादि गुणसमूहों के आधार बुद्धि तत्त्व को ही प्रायः आत्मा मानते हैं । अपवर्ग अर्थात् मोक्ष दशा में जब बुद्धि का उच्छेद हो जाता है (अर्थात् जब बुद्धि नहीं रह जाती) तब वे आत्मा को प्रायः शून्य ही समझते हैं । जो अहं (मैं) की प्रतीति से जाना जाता है और सुखदुःखादि उपाधियों६४ के ढका हुआ हैं वह आत्मा है-ऐसा माननेवाले मीमांसक लोग भी बुद्धि में ही चिपटे हुए हैं (अर्थात् बुद्धि को ही आत्मा समझते हैं) । सुगत६५ के अनुयायी ज्ञानसन्तति (ज्ञान के सतत प्रवाह) को ही तत्त्व मानते हैं । इसलिए उनके दर्शन का भी बुद्धि के व्यापार में ही पर्यवसान हैं । कुछ वेदान्त के जानकार कहते हैं कि प्राण ही आत्मा है । ❊ इत्यादि से वैशेषिक समझना चाहिए ।

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ६१ असदेव इदमासीत्-इत्यभावब्रह्मवादिनः शून्यभुवमवगाह्य स्थिताः । माध्यमिका अपि एवमेव । परा प्रकृतिः भगवान् वासुदेवः तद्विस्फुलिङ्गप्राया एव जीवाः- इति पाञ्चरात्राः परस्या प्रकृतेः परिणामाभ्युपगमात् अव्यक्ते एव अभिनिविष्टाः । सांख्यादयस्तु विज्ञानाकलप्रायां भूमिम् अवलम्बन्ते । सदेव इदमग्र आसीत्-इति ईश्वरतत्त्वपदमाश्रिता अपरे श्रुत्यन्तविदः । शब्दब्रह्ममयं पश्यन्तीरूपम् आत्मतत्त्वम्-इति वैयाकरणाः श्रीसदा- शिवपदमध्यासिताः । एवमन्यदपि अनुमन्तव्यम् । एतच्च आगमेषु (उपनिषद् में जो यह कहा गया है कि) यह सब कुछ (पहले) असत् ही था । (इसके आधार पर कुछ वेदान्ती) जो अभाव को ही ब्रह्म कहते हैं वे शून्यपद में ही प्रवेश कर स्थित हैं । माध्यमिक ६६ लोग भी इसी प्रकार हैं (इसी दशा में हैं) । पांचरात्रों ६७ का कहना है कि भगवान् वासुदेव ही सबसे उत्कृष्ट प्रकृति (कारण) हैं । जीव उनकी चिनगारी की तरह ही हैं । अतः जीव को परा (सर्वोत्कृष्ट) प्रकृति के परिणाम ६९ मानने के कारण वे अव्यक्त ७० में ही चिपटे हुए हैं । सांख्य ७१ इत्यादि प्रायः विज्ञानाकल ७२ भूमि का आश्रय लेते हैं । पहले यह सत् ही था— (इस उपनिषद् वाक्य के आधार पर) दूसरे वेदान्ती लोग ईश्वर तत्त्व पद पर आश्रित रहते हैं (अर्थात् ईश्वरतत्त्व को सर्वोच्च पद मानते हैं) । वैयाकरण ७३ लोग आत्मतत्त्व पश्यन्ती ७४ रूप में शब्द ब्रह्ममय ७५ है— यह मानते हुए सदाशिव पद में ही भटके रहते हैं (अर्थात् सदाशिव पद को ही परमार्थ समझ बैठते हैं) । इसी प्रकार अन्य दर्शनों के विषय में भी अनुमान कर लेना चाहिए (कि वे त्रिक दर्शन के एक अंश तक ही परिसीमित हैं)। यही बात आगमों ७६ में भी (निम्नलिखित शब्दों में) कही गई है :

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६२ प्रत्यभिज्ञाहृदय 'बुद्धितत्त्वे स्थिता बौद्धा गुणेष्वेवार्हताः स्थिताः । स्थिता वेदविदः पुंसि अव्यक्ते पाञ्चरात्रिकाः ॥ इत्यादिना निरूपितम् । विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम्-इति तान्त्रिकाः । विश्वमयम् इति-कुलाद्याम्नायनिविष्टाः । विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च-इति त्रिकादिदर्शनविदः । एवम् एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिताः सर्वा इमा भूमिकाः स्वातन्त्र्यप्रच्छादनोन्मीलनतारतम्यभेदिताः । अत एक एव एतावद्व्याप्तिक आत्मा । मितदृष्टयस्तु अंशांशिकासु तदिच्छयैव अभिमानं ग्राहिताः, येन देहादिषु भूमिषु पूर्वपूर्वप्रमातृव्याप्तिसारताप्रथायामपि उक्तरूपां महाव्याप्तिं परशक्तिपातं विना न लभन्ते । यथोक्तम् बौद्ध बुद्धितत्त्व में स्थित हैं, आर्हंत७७ गुणों में, वेदविद् पुरुष में, और पांचरात्रिक७८ अव्यक्त में स्थित हैं— तांत्रिक७९ यह कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे है। कुल आदि८० आम्नायों (आध्यात्मिक शास्त्रों) में जिनका अनुराग है वे आत्मतत्त्व को विश्वमय कहते हैं । त्रिकादि८१ दर्शनके जानने वाले कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे भी है और विश्वमय भी है । इस प्रकार जितने शास्त्र हैं वे सब चित् रूपी भगवान् की विभिन्न भूमिकाएँ हैं जिनको भगवान् अपने स्वातंत्र्य से प्रदर्शित करते हैं । इन भूमि- काओं के भेद उसी स्वातंत्र्य के आत्मगोपन और आत्म प्रकाशन के तारतम्य के कारण हैं। अतः एक ही आत्मा यहाँ तक (इन शास्त्रों की भूमिकाओं में) व्याप्त है। जिनकी परिमित (सीमित) दृष्टि है वे एक एक अंश में उस परमात्मा की इच्छा से भिन्न-भिन्न भूमिकाओं से तादात्म्य स्थापित कर बैठते हैं और जब कि (शास्त्र द्वारा) यह स्पष्ट भी कर दिया जाता है कि पहले के (वर्णित) प्रमाताओं की व्याप्ति का सार देह इत्यादि तक सीमित है तब भी ऊपर कहे हुए (आत्मतत्त्व विश्व से परे और विश्वमय दोनों है) महाव्याप्ति को पर (उच्चतम)८२ शक्तिपात के बिना नहीं प्राप्त कर पाते। जैसा कि कहा गया है।

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ६३ 'वैष्णवाद्यास्तु ये केचिद्विद्यारागेण रञ्जिताः । न विदन्ति परं देवं सर्वज्ञं ज्ञानशालिनम् ॥' इति । तथा 'भ्रमयत्येव तान्माया ह्यमोक्षे मोक्षलिप्सया । इति । 'त आत्मोपासकाः शैवं न गच्छन्ति परं पदम् ॥' इति च । अपि च सर्वेषां दर्शनानां'-समस्तानां नीलसुखादिज्ञानानां याः 'स्थितयः'-अन्तर्मुखरूपा विश्रान्तयः ताः तद्भूमिकाः'-चिदानन्द- वैष्णव इत्यादि जो (परिमित) विद्या' के रंग से रँगे हुए हैं उस परम देव को नहीं जानते जो सर्वज्ञ है और ज्ञानस्वभाव वाला है। इसी प्रकार (स्वच्छन्द तन्त्र के १० वें पटल, श्लोक ११४१ में कहा गया है कि) यह माया ही जो उन लोगों को (जो कि अन्य मार्गों के अनुयायी हैं) चक्कर में डाल देती हैं जो अमोक्ष (अन्य दर्शन और मार्ग जो मोक्ष नहीं प्राप्त करा सकते) मैं मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। और (नेत्र तन्त्र ८वें पटल के ३०वें श्लोक में कहा है) “वे जो परिच्छिन्न (सीमित) को आत्मा समझ कर उसमें अनुराग रखते हैं (अर्थात् जो देह बुद्धि इ० को आत्मा समझ कर उनमें अनुराग रखते हैं) वे शिव रूपी परम पद को नहीं पहुँच सकते । और भी (अर्थात् इस सूत्र की एक दूसरी भी व्याख्या है)। सर्वेषां दर्शनानां सब दर्शनों का अर्थात् नील सुख इत्यादि ज्ञानों का (इस दूसरी व्याख्या में दर्शन का अर्थ ज्ञान-सरणि नहीं है, ज्ञान है अर्थात् बाह्यज्ञान जैसे नील इत्यादि रंग, और आन्तर ज्ञान जैसे सुख इत्यादि) स्थितयः-स्थितियाँ अर्थात् अन्तर्मुख रूप विश्रान्तियाँ (इस व्याख्या में स्थिति का अर्थ सिद्धान्त नहीं, किन्तु अन्तर्मुख विश्रान्ति है) तद्भूमिकाः-तत्-उसकी अर्थात् चिदानन्दघन रूपी आत्मस्वरूप की, भूमिकाएँ अर्थात् अभिव्यक्ति के उपाय (इस व्याख्या में भूमिका का अर्थ अवस्था या भेद नहीं है, किन्तु अभिव्यक्ति का उपाय है)।