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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 61 of 187

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Page 61

प्रत्यभिज्ञाहृदय ५१ श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक-परमानन्दमय-प्रकाशैक- घनस्य एवंविधमेव शिवाद‌ि-धरण्यन्तम् अखिलम् अभेदेनैव स्फुरति ; न तु वस्तुतः अन्यत् किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वा ; अपि तु श्रीपरम- शिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति-इत्यभिहित- प्रायम् ॥ ३ ॥ यथा च भगवान् विश्वशरीरः, तथा चितिसंकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचितविश्वमयः ॥४॥ श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं सदाशिवायुचितेन रूपेण अवविभासयिषुः पूर्वं चिदैक्याख्यातिमयानाश्रितशिवपर्याय- शून्यातिशून्यात्मतया प्रकाशाभेदेन प्रकाशमानतया स्फुरति ; ततः चिद्रसाश्यानतारूपाशेषतत्त्वभुवन भाव-तत्तत्प्रमात्राद्यात्मतयाऽपि प्रथते । यथा च एवं भगवान् विश्वशरीरः, तथा 'चितिसंकोचात्मा' संकुचित- अवस्था में जो कि विश्व से परे है और विश्वमय भी है, जो परमानन्दरूप है, जो सघन प्रकाश है, सब कुछ—शिव से लेकर पृथिवी तक अभेदरूप से ही प्रकाशित होता रहता है । वस्तुतः अन्य कोई ग्राह्य-ग्राहक है ही नहीं । पूज्य (भट्टारक) परमशिव ही इस प्रकार सहस्त्रों भिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है । यही इस सूत्र के कहने का तात्पर्य है । जैसे भगवान् का समस्त विश्व शरीर रूप ही है, वैसे ही सूत्र ४—वह चेतन भी (व्यष्टि, चेतन व्यक्ति भी) जिसमें चिति संकुचित हो गई है, संकुचित रूप में विश्वमय ही है । [ अर्थात् जैसे समष्टिचेतन अथवा परमशिव से विश्व अभिन्न है विश्व उसका शरीर रूप ही है, उसी प्रकार व्यष्टिचेतन अर्थात् व्यक्ति भी विश्वमय है । अन्तर यह है कि व्यष्टिचेतन में चिति संकुचित रहती है । इसलिए उसका विश्व भी संकुचित रहता हैं । परमशिव का समस्त विश्व शरीर है । व्यक्तिचेतन का विश्व पाँच-छः फीट वाला शरीर है । ] भाष्य—श्री परमशिव, विश्व को, जो कि तादात्म्यरूप में उनमें स्थित है, सदाशिव आदि उपयुक्त रूप से प्रकाशित करने की इच्छा रखते हुए, पहले प्रकाश से अभिन्न रूप में अर्थात् प्रकाश के ही रूप में प्रकाशित होते हैं । इस अवस्था में चिदैक्य की (चिदेकता की वह अवस्था जिसमें चित् ओर विश्व