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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 62 of 187

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Page 62

चिद्रूपः, 'चेतनो' ग्राहकोऽपि वटधानिकावत् संकुचिताशेषविश्वरूपः । तथा च सिद्धान्तवचनम् । 'विग्रहो विग्रही चैव सर्वविग्रहविग्रही ।' इति । त्रिशिरोमतेऽपि 'सर्वदेवमयः कायस्तं चेदानीं शृणु प्रिये । पृथिवी कठिनत्वेन द्रवत्वेऽम्भः प्रकीर्तितम् ।।' इत्युपक्रम्य 'त्रिशिरोभैरवः साक्षाद्व्याप्य विश्वं व्यवस्थितः ।।' इत्यन्तेन ग्रन्थेन ग्राहकस्य संकुचितविश्वमयत्वमेव व्याहरति । एक रूप है) अख्याति* (बोध से हट जाना) हो जाती है। इस अवस्था का अनाश्रित शिव ४१ पर्याय (दूसरा नाम) है जिसमें शून्य से भी अधिक शून्य ४२ रहता है। (अर्थात् विश्व का अभाव (शून्य) सा हो जाता है, केवल प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है) । इसके अनन्तर वह सब तत्त्व, भुवन, भाव (पदार्थ) और इनके प्रमाताओं (ज्ञाताओं) के रूप में भी प्रकाशित होता है। ये सब चिद्रस के घनीभूत रूप हैं (चिद्रसाश्यानतारूप) और जैसे इस प्रकार भगवान् का सम्पूर्ण विश्व शरीर है, वैसे ही उस चेतन अर्थात् ग्राहक या प्रमाता का-जिसका चित् संकुचित हो गया है (चितिसंकोचात्मा) संकुचित रूप में समस्त विश्व शरीर है जिस प्रकार वट वृक्ष (संकुचित रूप में) अपने बीज में रहता है । (इस शास्त्र का) सिद्धान्त वचन भी है। “एक शरीर और शरीरी में सब शरीर और शरीरियों का अन्तर्भाव है।" त्रिशिरोमत ४३ में भी "यह शरीर सभी देवों ४४ का रूप है। हे प्रिये ४५ इसके विषय में सुनो। काठिन्य के कारण यह पृथ्वी कहलाता है और द्रवत्व के कारण जल।" इस प्रकार प्रारम्भ करके तीन शिर वाला भैरव ४६ विश्व में व्याप्त होकर साक्षात् व्यवस्थित है। अन्त में इस प्रकार कहकर यही बतलाया है कि (संकुचित) ग्राहक या प्रमाता संकुचित रूप में विश्वमय ही है।

  • 'अख्याति' का अर्थ है "शिवस्वरूपापोहनम्" अर्थात् वह स्थिति जिसमें शिव का पूर्ण स्वरूप ओझल हो जाता है, शिव का पूर्ण स्वरूप वह है जिसमें शिव और विश्व का एकीभाव है, इसी को 'चिदैक्य' कहा है। विश्व का निषेध हो जाना 'चिदैक्य की अख्याति' है। इस अख्यातिमय अवस्था का दूसरा नाम 'अनाश्रित शिव' है।