प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context६२ प्रत्यभिज्ञाहृदय 'बुद्धितत्त्वे स्थिता बौद्धा गुणेष्वेवार्हताः स्थिताः । स्थिता वेदविदः पुंसि अव्यक्ते पाञ्चरात्रिकाः ॥ इत्यादिना निरूपितम् । विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम्-इति तान्त्रिकाः । विश्वमयम् इति-कुलाद्याम्नायनिविष्टाः । विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च-इति त्रिकादिदर्शनविदः । एवम् एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिताः सर्वा इमा भूमिकाः स्वातन्त्र्यप्रच्छादनोन्मीलनतारतम्यभेदिताः । अत एक एव एतावद्व्याप्तिक आत्मा । मितदृष्टयस्तु अंशांशिकासु तदिच्छयैव अभिमानं ग्राहिताः, येन देहादिषु भूमिषु पूर्वपूर्वप्रमातृव्याप्तिसारताप्रथायामपि उक्तरूपां महाव्याप्तिं परशक्तिपातं विना न लभन्ते । यथोक्तम् बौद्ध बुद्धितत्त्व में स्थित हैं, आर्हंत७७ गुणों में, वेदविद् पुरुष में, और पांचरात्रिक७८ अव्यक्त में स्थित हैं— तांत्रिक७९ यह कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे है। कुल आदि८० आम्नायों (आध्यात्मिक शास्त्रों) में जिनका अनुराग है वे आत्मतत्त्व को विश्वमय कहते हैं । त्रिकादि८१ दर्शनके जानने वाले कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे भी है और विश्वमय भी है । इस प्रकार जितने शास्त्र हैं वे सब चित् रूपी भगवान् की विभिन्न भूमिकाएँ हैं जिनको भगवान् अपने स्वातंत्र्य से प्रदर्शित करते हैं । इन भूमि- काओं के भेद उसी स्वातंत्र्य के आत्मगोपन और आत्म प्रकाशन के तारतम्य के कारण हैं। अतः एक ही आत्मा यहाँ तक (इन शास्त्रों की भूमिकाओं में) व्याप्त है। जिनकी परिमित (सीमित) दृष्टि है वे एक एक अंश में उस परमात्मा की इच्छा से भिन्न-भिन्न भूमिकाओं से तादात्म्य स्थापित कर बैठते हैं और जब कि (शास्त्र द्वारा) यह स्पष्ट भी कर दिया जाता है कि पहले के (वर्णित) प्रमाताओं की व्याप्ति का सार देह इत्यादि तक सीमित है तब भी ऊपर कहे हुए (आत्मतत्त्व विश्व से परे और विश्वमय दोनों है) महाव्याप्ति को पर (उच्चतम)८२ शक्तिपात के बिना नहीं प्राप्त कर पाते। जैसा कि कहा गया है।