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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 73 of 187

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ६३ 'वैष्णवाद्यास्तु ये केचिद्विद्यारागेण रञ्जिताः । न विदन्ति परं देवं सर्वज्ञं ज्ञानशालिनम् ॥' इति । तथा 'भ्रमयत्येव तान्माया ह्यमोक्षे मोक्षलिप्सया । इति । 'त आत्मोपासकाः शैवं न गच्छन्ति परं पदम् ॥' इति च । अपि च सर्वेषां दर्शनानां'-समस्तानां नीलसुखादिज्ञानानां याः 'स्थितयः'-अन्तर्मुखरूपा विश्रान्तयः ताः तद्भूमिकाः'-चिदानन्द- वैष्णव इत्यादि जो (परिमित) विद्या' के रंग से रँगे हुए हैं उस परम देव को नहीं जानते जो सर्वज्ञ है और ज्ञानस्वभाव वाला है। इसी प्रकार (स्वच्छन्द तन्त्र के १० वें पटल, श्लोक ११४१ में कहा गया है कि) यह माया ही जो उन लोगों को (जो कि अन्य मार्गों के अनुयायी हैं) चक्कर में डाल देती हैं जो अमोक्ष (अन्य दर्शन और मार्ग जो मोक्ष नहीं प्राप्त करा सकते) मैं मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। और (नेत्र तन्त्र ८वें पटल के ३०वें श्लोक में कहा है) “वे जो परिच्छिन्न (सीमित) को आत्मा समझ कर उसमें अनुराग रखते हैं (अर्थात् जो देह बुद्धि इ० को आत्मा समझ कर उनमें अनुराग रखते हैं) वे शिव रूपी परम पद को नहीं पहुँच सकते । और भी (अर्थात् इस सूत्र की एक दूसरी भी व्याख्या है)। सर्वेषां दर्शनानां सब दर्शनों का अर्थात् नील सुख इत्यादि ज्ञानों का (इस दूसरी व्याख्या में दर्शन का अर्थ ज्ञान-सरणि नहीं है, ज्ञान है अर्थात् बाह्यज्ञान जैसे नील इत्यादि रंग, और आन्तर ज्ञान जैसे सुख इत्यादि) स्थितयः-स्थितियाँ अर्थात् अन्तर्मुख रूप विश्रान्तियाँ (इस व्याख्या में स्थिति का अर्थ सिद्धान्त नहीं, किन्तु अन्तर्मुख विश्रान्ति है) तद्भूमिकाः-तत्-उसकी अर्थात् चिदानन्दघन रूपी आत्मस्वरूप की, भूमिकाएँ अर्थात् अभिव्यक्ति के उपाय (इस व्याख्या में भूमिका का अर्थ अवस्था या भेद नहीं है, किन्तु अभिव्यक्ति का उपाय है)।

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