प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextप्रत्यभिज्ञाहृदय ६५ उक्तं च श्रीप्रत्यभिज्ञाटीकायाम्— 'तावदर्थाविलेहेन उत्तिष्ठति, पूर्णा च भवति' इति। एषा च भट्टारिका क्रमात्क्रमम् अधिकमनुशील्यमाना स्वात्मसात्करोत्येव भक्तजनम् ॥ ८ ॥ यदि एवंभूतस्य आत्मनो विभूतिः, तत् कथम् अयं मलावृतः अणुः कलादिवलितः संसारी अभिधीयते ? -इत्याह— चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृतः संसारी ॥६॥ यदा 'चिदात्मा'परमेश्वरः स्वस्वातान्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिम् अवलम्बते, तदा 'तदीया इच्छादिशक्तयः' असंकुचिता अपि 'संकोचवत्यो भान्ति; तदानीमेव च अयं 'मलावृतः संसारी' भवति। तथा च अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपा इच्छाशक्तिः संकुचिता श्री प्रत्यभिज्ञा टीका में कहा भी है। अर्थों (पदार्थों, सभी प्रमेयों) को चाट लेने से अर्थात् ग्रास कर लेने से वह उठती है अर्थात् अपने स्वरूप में स्फुरण करती है और इस प्रकार पूर्ण होती है। यदि इस पूज्य चेतना का अधिक अनुशीलन किया जाय तो वह भक्तों को क्रमशः अपने में मिला लेती है ॥ ८ ॥ यदि इस प्रकार वाले (जैसा कि ऊपर बतलाया गया है) आत्मा की (ऐसी) विभूति (महत्ता) है, तो यह (आत्मा) कैसे मल ८५ से ढका जाकर, कला ८६ इत्यादि कंचुकों से घेरा जाकर अणु (जीव) और संसारी (एक जीवन से दूसरे जीवन में संसरण करने वाला) कहा जाता है?— इस प्रश्न के उत्तर में यह कहते हैं :- सूत्र ६—जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मल से ढका हुआ संसारी बन जाता है। भाष्य—जब परमेश्वर जो चित्स्वरूप है अपने स्वातंत्र्य से अभेद को लीन कर भेद का अवलम्बन करता है तब उसकी इच्छा तथा अन्य शक्तियाँ स्वभावतः असंकुचित होते हुए भी संकुचित जैसी लगने लग जाती हैं, तब यह जीव मल से ढका हुआ संसारी बन जाता है। इस प्रकार परमेश्वर की