प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context६६ प्रत्यभिज्ञाहृदय सती अपूर्णम्मन्यतारूपम् आणवं मलम् ; ज्ञानशक्तिः क्रमेण संकोचात् भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्वाप्तेः अन्तःकरण-बुद्धीन्द्रियतापत्तिपूर्वकम् अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथारूपं मायीयं मलम्; क्रियाशक्तिः क्रमेण भेदे सर्वकर्तृत्वस्य किंचित्कर्तृत्वाप्तेः कर्मेन्द्रियरूप-संकोचग्रहण- पूर्वम् अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्मं मलम् । तथा सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व नित्यत्व-व्यापकत्वशक्तयः संकोचं गृह्णाना यथाक्रमं कला-विद्या-राग-काल-नियतिरूपतया भान्ति । तथाविधश्च अयं शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते ; स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ॥ ६ ॥ ननु संसार्यवस्थायाम् अस्य किंचित् शिवतोचितम् अभिज्ञानमस्ति येन शिव एव तथावस्थितः ?-इत्युद्घोष्यते 'अस्ति'-इत्याह स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति जो स्वरूपतः अबाध है संकुचित होकर आणव मल बन जाती है जिसके द्वारा जीव अपने को अपूर्ण मानने लगता है । क्रम से संकोच के कारण भेद की अवस्था में ज्ञान शक्ति का सर्वज्ञत्व किंचिज्ज्ञत्व को पहुँच जाता है और अत्यन्त संकोच ग्रहण करने पर वह अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियों की अवस्था प्राप्त कर मायीयमल धारण कर लेती है जिसका स्वभाव है सब वस्तुओं को भिन्न रूप में जानना । क्रम से भेद की अवस्था में क्रियाशक्ति का सर्वकर्तृत्व ( सब कुछ कर लेने की शक्ति ) किंचित्कर्तृत्व ( कुछ ही करने की शक्ति ) की दशा को पहुँच जाता है और क्रियाशक्ति कर्मेन्द्रियरूप संकोच को ग्रहण करके अत्यन्त परिमित अवस्था को प्राप्त होकर कार्म मल^८८ को धारण कर लेती है जिसका स्वभाव है शुभ और अशुभ कर्मों का करना । इसी प्रकार सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, व्यापकत्व शक्तियाँ संकोच ग्रहण करके यथाक्रम कला, विद्या, राग, काल, और नियति के रूप में भान होती हैं ।^८९ इस रूप में यह जीव शक्ति में दरिद्र होकर संसारी कहलाता है । अपनी शक्तियों के विकास होने पर तो वह शिव ही है ॥ ६ ॥ प्रश्न यह है कि जब अणु ( जीव ) संसारी की अवस्था में रहता है तो क्या उस अवस्था में शिवत्व के अनुरूप कोई ऐसी पहिचान है जिससे यह जाना जा सके कि शिव ही इस प्रकार से ( अर्थात् संसारी की दशा में ) अवस्थित है ? शास्त्र यह घोषणा करता है कि हाँ, है । इसे ( आगे का सूत्र ) कहता है :-