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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 77 of 187

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Page 77

प्रत्यभिज्ञाहृदय ६७ तथापि तद्वत् पञ्च कृत्यानि करोति ॥ १० ॥ इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः अयमेव विशेषः, यत् ‘सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ॥ इति श्रीमत्स्वच्छन्दादिशासनोक्तनीत्या सदा पञ्चविधकृत्यका- रित्वं चिदात्मनो भगवतः । यथा च भगवान् शुद्धेतराध्वस्फारणाक्रमेण स्वरूपविकासरूपाणि सृष्ट्यादीनि करोति, ‘तथा’ संकुचितचिच्छ- क्तितया संसारभूमिकायामपि ‘पञ्चकृत्यानि’ विधत्ते । तथा हि ‘तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ॥’ इति प्रत्यभिज्ञाकारिकोक्तार्थदृष्ट्या देहप्राणादिपदम् आविशन् चिद्रूपो महेश्वरो बहिर्मुखीभावावसरे नीलादिकमर्थं नियतदेशका- सूत्र १०—इस दशा (संसारी की दशा) में भी उसी (शिव) के समान जीव पाँच कृत्य करता है । यहाँ ईश्वराद्वयदर्शन ८९ का ब्रह्मवादियों ९१ से यह भेद है कि चित्स्व- रूप भगवान् का श्रीमत् स्वच्छन्द इत्यादि शास्त्र में कहे हुए ढंग (निम्न- लिखित) के अनुसार सदा पाँच प्रकार का कृत्य चलता रहता है: “मैं सृष्टि और संहार को करनेवाले, विलय और स्थिति को करनेवाले अनुग्रह करने- वाले और अपने सम्मुख नत (भक्त) के दुःख का नाश करनेवाले देव को प्रणाम करता हूँ” (स्वच्छन्द तंत्र प्रथम पटल, तृतीय श्लोक) । जिस प्रकार भगवान् अशुद्ध अध्वा ९२ में विस्तारक्रम से अपने स्वरूप का विकास रूप सृष्टि इत्यादि करते हैं, वैसेही संकुचित चित् शक्ति से संसार दशा में भी वह पंचकृत्य करते हैं । जैसा कहा गया है । “इस प्रकार व्यवहार दशा में भी प्रभु देह इत्यादि में प्रवेश कर अपने भीतर प्रकाशमान अर्थ-समूह को अपनी इच्छा से बाहर व्यक्त करते हैं । (ई० प्र० ६-७) ।” इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा कारिका में कहे हुए अर्थ की दृष्टि से चिद्रूप महेश्वर देहप्राण इत्यादि में प्रवेश करके बहिर्मुखीभाव के अवसर पर जब