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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 78 of 187

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Page 78

६८ प्रत्यभिज्ञाहृदय लादितया यदा आभासयति, तदा नियतदेशकालाद्याभासांशे अस्य स्रष्टृता; अन्यदेशकालाद्याभासांशे अस्य संहर्तृता; नीलाद्याभासांशे स्थापकता; भेदेन आभासांशे विलयकारिता; प्रकाशैक्येन प्रकाशने अनुग्रहीतृता । यथा च सदा पञ्चविधकृत्यकारित्वं भगवतः, तथा मया वितत्य स्पन्दसंदोहे निर्णीतम् । एवमिदं पञ्चविधकृत्यकारित्वम् आत्मीयं सदा दृढप्रतिपत्त्या परिशील्यमानं माहेश्वर्यम् उन्मीलयत्येव भक्तिभाजाम् । अत एव ये सदा एतत् परिशीलयन्ति, ते स्वरूपविकासमयं विश्वं जानाना जीव- न्मुक्ता-इत्याम्नाताः । ये तु न तथा, ते सर्वतो विभिन्नं मेयजातं पश्यन्तो बद्धात्मानः ॥ १० ॥ न च अयमेव प्रकारः पञ्चविधकृत्यकारित्वे, यावत् अन्योऽपि कश्चित् रहस्यरूपोऽस्ति १-इत्याह नील इत्यादि विषयों को नियत देश, काल इत्यादि में आभासित करते हैं, तब नियत देश, काल इत्यादि में जो आभासित हो रहा है यह उनकी सृष्टिक्रिया है; विषयों का अन्य देश और काल में आभासित होना उनकी संहार क्रिया है। नील इत्यादि के आभास का बना रहना उनकी स्थापकता अथवा स्थितिक्रिया है; भेद से आभास होना उनकी विलयक्रिया ९४ है और विषयों का चित्प्रकाश के ऐक्य से प्रकाशित होना ९५ उनकी अनुग्रह क्रिया है। भगवान् जिस प्रकार सदा पाँच प्रकार के कृत्य करते हैं उसे मैंने विस्तारपूर्वक 'स्पन्दसंदोह' (नामक ग्रंथ) में स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार अपने भीतर जो पाँच प्रकार का कृत्य चलता रहता है यदि अच्छी तरह समझ कर उसका परिशीलन किया जाय तो वह भक्तजनों के निकट प्रभु के महान् ऐश्वर्य को व्यक्त कर देता है। अतएव जो सदा इसका परिशीलन करते हैं वे विश्व को चित् का विकास समझ कर जीवन्मुक्त हो जाते हैं—ऐसा आम्नायों (परम्परागत शास्त्र) का कहना है। जो इस प्रकार परिशीलन नहीं करते, वे सब ज्ञेय विषयों को भिन्न समझते हुए बन्धन में ही पड़े रहते हैं ॥ १० ॥ पाँच प्रकार के कृत्य करने का केवल यही एक प्रकार नहीं है, दूसरा भी रहस्यरूप (पंचकृत्य) है—इसे लिए अब सूत्रकार कहते हैं।