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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 79 of 187

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Page 79

प्रत्यभिज्ञाहृदय ६६ आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन- विलापनतस्तानि ।।११।। 'पञ्चविधकृत्यानि करोति' इति पूर्वतः संबध्यते । श्रीमन्महा- र्थदृष्ट्या दृगादिदेवीप्रसरणक्रमेण यत् यत् आभाति, तत् तत् सृज्यते; तथा सृष्टे पदे तत्र यदा प्रशान्तनिमेषं कंचित् कालं रज्यति, तदा स्थितिदेव्या तत् स्थाप्यते; चमत्कारापरपर्यायविमर्शनसमये संह्रियते । यथोक्तं श्रीरामेण । समाधिवज्रेणाप्यन्यैरभेद्यो भेदभूधरः । परामृष्टश्च नष्टश्च त्वद्भक्तिबलशालिभिः ।' इति। यदा तु संह्रियमाणमपि एतत् श्रन्तः विचित्रशङ्कादिसंस्का- रम् आधत्ते, तदा तत् पुनः उद्भविष्यत्संसारबीजभावमापन्नं विलय सूत्र ११—प्रकाशन- आस्वादन, आत्मबोध, बीज का अवस्थापन, विलापन (भेद) से इनको अर्थात् इन पाँच कृत्यों को करता ९६ है। इस प्रकार इसका पूर्व (सूत्र) से संबंध है। महार्थदृष्टि से ९७ (सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य की दृष्टि से) नेत्रेन्द्रिय इत्यादि देवियों के प्रसरण क्रम से (अर्थात् भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के कार्य के द्वारा) जो कुछ प्रकाशित होता है वह सृष्टि है। (यह आभासन वा प्रकाशन है)। सृष्टि हो जाने पर (अर्थात् किसी पदार्थ के प्रकाशन हो जाने पर) बिना आँख बन्द किये हुए कुछ काल तक जब जीव उसमें आस्वादन वा आनन्द लेता है, तब स्थिति देवी द्वारा वह (अनुभव में) स्थापित किया जाता है। (यही स्थिति है)। विमर्शन जिसकी दूसरी संज्ञा चमत्कार ९८ है—के समय (उस पदार्थ का) संहार ९९ होता है। (पदार्थ की यह अनुभूति संहार है)। जैसा कि श्रीराम ने कहा है “वह भेद का पर्वत, जिसका और लोग समाधिवज्र से भी भेदन नहीं कर सकते, वह उन लोगों के द्वारा जिन्होंने तुम्हारी भक्ति का बल प्राप्त कर लिया है, आत्म- चेतनावत् प्रतीत होता है (परामृष्टः) और इस प्रकार वह (भेदपर्वत) नष्ट हो जाता है"। जब (ज्ञानरूप में) सिमट जाने पर भी (साधक के) भीतर विचित्र शंका इत्यादि के संस्कार खड़े हो जाते हैं, तो फिर से होनेवाले संसार के