प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in context७४ प्रत्यभिज्ञाहृदय पदम् अध्यारोपितम् । यदा पुनः तत् तथा अन्तः स्थापितम् अन्यत् वा अनुभूयमानमेव हठपाकक्रमेण अलंग्रासयुक्त्या चिदग्निसद्भावम् आपद्यते, तदा पूर्णतापादनेन अनुगृह्यते एव । ईदृशं च पञ्चविध- कृत्यकारित्वं सर्वस्य सदा संनिहितमपि सद्गुरूपदेशं विना न प्रका- शते, इति सद्गुरुसपर्यैव एतत्प्रथार्थम् अनुसर्तव्या ।। ११ ।। यस्य पुनः सद्गुरूपदेशं विना एनत्परिज्ञानं नास्ति, तस्य अवच्छादित- स्वस्वरूपाभिः निजाभिः शक्तिभिः व्यामोहित्वं भवति । -इत्याह तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् ।। १२ ।। ‘तस्य’ एतस्य सदा संभवतः पञ्चविधकृत्यकारित्वस्य ‘अपरिज्ञाने’ -शक्तिपातहेतुकस्वबलोन्मीलनाभावात् अप्रकाशने ‘स्वाभिः शक्तिभिः बीज भाव को पहुँचे हुए विलय का (अर्थात् आत्मस्वरूप के गोपन) का अध्यारोप होता है । जब फिर वह (संसार बीज) अथवा भीतर में स्थापित और कुछ जिसका अनुभव हो रहा है हठपाक क्रम१०० से और अलंग्रास- युक्ति१०१ से चिदग्निसद्भाव को प्राप्त हो जाता है (अर्थात् चित् रूपी अग्नि में जलकर चित् रूप ही हो जाता है) तो पूर्णता प्राप्त हो जाने के कारण वह (साधक) अनुग्रह का अनुभव करता है । इस प्रकार की पंच- कृत्य की कर्तृता सबके लिए सदा निकट होने पर भी सद्गुरु के उपदेश के बिना प्रकाशित नहीं होती । इसलिए इसके स्पष्ट होने के लिए सद्गुरु की सेवा का अनुसरण करना चाहिए ।। ११ ।। सद्गुरु के उपदेश के बिना जिसको यह ज्ञान (पंचकृत्य का ज्ञान) नहीं होता उसको अपनी ही उन शक्तियों से मोह (अज्ञान) होता है जिनका (अपना अपना) वास्तविक स्वरूप ढका हुआ है । सूत्र १२—संसारदशा उसके (पंचकृत्य के) अज्ञान के कारण अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाना है । भाष्य-सूत्र में जो तत् शब्द आया है उसका अर्थ है 'सदा होते रहनेवाले पाँच प्रकार के कृत्यों के करने का' 'अज्ञान' का अर्थ है शक्तिपात के कारण अपने बल का जो प्राकट्य होता है उसके अभाव के कारण अप्रकाशन