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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 81 of 187

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ७१

व्यामोहितत्वं' - विविधलौकिकशास्त्रीयशङ्काशंकुकीलितत्वं यत्, इदमेव 'संसारित्वम्' । तदुक्तं श्रीसर्ववीरभट्टारके 'अज्ञानाच्छङ्कते लोकस्ततः सृष्टिश्च संहृतिः ॥ इति । 'मन्त्रा वर्णात्मकाः सर्वे सर्वे वर्णाः शिवात्मकाः ॥' इति च तथा हि-चित्प्रकाशात् अव्यतिरिक्ता नित्योदितमहामन्त्र- रूपा पूर्णाहंविमर्शमयी या इयं परा वाक्शक्तिः आदि-क्षान्त-रूपाशेष- शक्तिचक्रगर्भिणी, सा तावत् पश्यन्तीमध्यमादिक्रमेण ग्राहकभूमिकां भासयति । तत्र च परारूपत्वेन स्वरूपम् अप्रथयन्ती मायाप्रमातुः अस्फुटासाधारणार्थविभासरूपां प्रतिक्षणं नवनवां विकल्पक्रियामुल्लास- यति, शुद्धामपि च अविकल्पभूमिं तदाच्छादितामेव दर्शयति । तत्र च

(न प्रकाश होना) । 'अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाने का' अर्थ है नाना प्रकार की लौकिक और शास्त्रीय शंका रूपी कीलों से जकड़ उठना । यही संसार दशा है । श्रीसर्ववीरभट्टारक में कहा है "लोगों में अज्ञान से ही शंका होती है और उसी से जन्म-मरण होता रहता है"। यह भी कहा गया है "सभी मंत्र१०२ वर्णरूप (अक्षररूप) हैं और सभी वर्ण शिवरूप हैं।" तो फिर जो यह चित्प्रकाश से अभिन्न परावाक्१०३ शक्ति है जो नित्योदित (नित्य उच्चरित) महामन्त्र रूप है जो पूर्ण अहं (मैं) ज्ञानरूपी है जो 'अ' से लेकर 'क्ष' तक१०४ समस्त शक्ति-समूह को अपने गर्भ में धारण किये हुए है वही पश्यन्ती, मध्यमा१०५ इत्यादि क्रम से ग्राहक (ज्ञाता) अवस्था को अवभासित करती है । इसमें (अर्थात् ग्राहक भूमिका में) वह (शक्ति) अपने परारूप जो कि उसका वास्तविक स्वरूप है—का गोपन करती हुई मायाप्रमाता में प्रति- क्षण नई-नई विकल्प-क्रिया१०६ को उद्भासित करती है जिस क्रिया द्वारा अस्फुट और विशेष पदार्थों का अवभास होता है, और अविकल्प-भूमि१०७ को जो अपने स्वरूप में शुद्ध ही है उससे (विकल्प क्रिया से) आच्छादित रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसी अवस्था में मूढ़जन ब्राह्मी इत्यादि देवताओं से