Skip to content
BharatKosha
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 82 of 187

Read in context
Page 82

७२ प्रत्यभिज्ञाहृदय ब्राह्म्यादिदेवताधिष्ठितककारादिविचित्रशक्तिभिः व्यामोहितो देह- प्राणादिमेव परिमितम् अवशम् आत्मानं मन्यते मूढजनः । ब्राह्म्यादि- देव्यः पशुदशायां भेदविषये सृष्टिस्थिती, अभेदविषये च संहारं प्रथयन्त्यः परिमितविकल्पपात्रतामेव संपादयन्ति; पतिदशायां तु भेदे संहारम्, अभेदे च सर्गस्थिती प्रकटयन्त्यः, क्रमात्क्रमं विकल्पनिर्ह्रासेनेन श्रीमद्- भैरवमुद्रानुपवेशमयीं महतीम् अविकल्पभूमिमेव उन्मीलयन्ति । सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ इत्यादिरूपां चिदानन्दावेशमग्नां शुद्धविकल्पशक्तिम् उल्लासयन्ति ततः उक्तनीत्या स्वशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम् । अधिष्ठित ककार इत्यादि विचित्र शक्तियों से व्यामोहित होकर परिसीमित देह, प्राण इत्यादि को विवश होकर 'आत्मा' मान लेता है । ब्राह्मी आदि देवियां पशु दशा में ( बद्धजीवदशा में ) भेद की सृष्टि और स्थिति और अभेद का संहार अभिव्यक्त करती हुई पशु ( बद्धजीव में) केवल परिमित विकल्प की पात्रता उत्पन्न करती हैं, पतिदशा में ( मुक्तदशा में ) ये भेद का संहार और अभेद की सृष्टि-स्थिति प्रकट करती हुई१०९ क्रमशः विकल्प को हटाती हुई महती अविकल्पभूमि को अभिव्यक्त करती हैं "जिसके द्वारा जीव भैरव मुद्रा११० में प्रवेश करता हैं और ये उस भूमि में शुद्धविकल्प शक्ति१११ की अवतारणा करती हैं जो कि चिदानन्द के आवेश में मग्न रहती है (जिसके द्वारा जीव को इस प्रकार का अनुभव होता है) "जो यह जानता है कि सब कुछ मेरा ही ( आत्मा का ही ) वैभव है, जो यह अनु- भव करता है कि समस्त विश्व मेरा आत्मा ही हैं, उसमें विकल्पों११२ के प्रकट होने पर भी महेशता११३ वर्तमान रहती है (ई० प्र० आ० २,१२) । अतः जैसा ऊपर बतलाया गया हैं संसारदशा अपनी शक्तियों द्वारा मोहित हो जाना ही है । और भी भगवती चितिशक्ति ही संसार को वमन ( सृष्टि ) करने के कारण और संसार रूपी वाम ( विपरीत ) आचार के कारण वामेश्वरी११४ कहलाती है और अपनी खेचरी११५ रूप के द्वारा सब प्रमाताओं के रूप में, गोचरी रूप के द्वारा सारे अन्तःकरणों के रूप में, दिक्त्चरी रूप के द्वारा सब