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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 83 of 187

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Page 83

प्रत्यभिज्ञाहृदय ७३ किंच चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी-गोचरी-दिक्धरी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ- अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती, पशुभूमिकायां शून्य- पदविश्रान्ता किंचित्कर्तृत्वद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति; भेदनिश्चयाभि- मान-विकल्पनप्रधानान्तःकरणदेवी रूपेण गोचरीचक्रेण गोपिताभेदनिश्च- याद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते; भेदालोचनादिप्रधानबहिष्करण- देवतात्मना च दिक्धरीचक्रेण गोपिताभेदप्रथात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण स्फुरति; सर्वतो व्यवच्छिन्नाभासस्वभावप्रमेयात्मना च भूचरीचक्रेण बाह्य इन्द्रियों के रूप में, भूचरी रूप के द्वारा सारे पदार्थों के रूप में प्रकट होती हुई, पशुदशा (जीवदशा) में शून्यपद में विश्राम करती हुई (अर्थात् आत्मस्वरूप को गोपन करती हुई) खेचरी चक्र (शक्तिसमूह) के द्वारा अपने पारमार्थिक चिद्गगनस्वरूप को छिपाती हुई किंचित्कर्तृत्व (थोड़ा-सा करने की शक्ति-रूपी) कलादिशक्ति के रूप में अवभासित होती है, गोचरीचक्र (गोचरी शक्ति समूह) के द्वारा अभेदनिश्चयात्मक जो अपना पारमार्थिक स्वरूप है उसे छिपाकर अन्तःकरण देवी११६ रूप में प्रकाशित होती है जिसका (जिस अन्तःकरण का) प्रधान व्यापार है भेदका निश्चय (बुद्धि- द्वारा) भेदाभिमान-अर्थात् भेद से (अनात्म से) तादात्म्य स्थापित करना (अभिमान-अहंकार द्वारा) भेद-विकल्पन-अर्थात् पदार्थों को भिन्न-भिन्न रूप से ग्रहण करना (मन द्वारा), दिक्कचरी चक्र (दिक्धरी शक्ति समूह) द्वारा अपने अभेद को प्रकाश करने वाले पारमार्थिक स्वरूप को छिपा कर बहिष्करण (बाह्य इन्द्रिय) देवता रूप में प्रकट होती हैं जिसका प्रधान व्यापार है भेद को ही देखना इत्यादि, भूचरी चक्र (भूचरी शक्ति समूह) द्वारा अपने सर्वात्म्य स्वरूप को (अर्थात् सभी पदार्थ मैं ही हूँ इस भाव को) छिपाकर और पशु (जीव) के हृदय को व्यामोहित कर चारों ओर प्रमेयों (ज्ञेयों) के रूप में भान होती है जिन प्रमेयों का स्वभाव है परस्पर पृथक् पृथक् रूप में दिखलाई देना। किन्तु पतिदशा में शक्ति सब कुछ कर डालने वाली चिद्गगनचरी के रूप में, अभेद का निश्चय इत्यादि करनेवाली गोचरी के रूप में, अभेद का प्रत्यक्ष इत्यादि सम्पन्न करनेवाली दिक्धरी के रूप में, प्रमेयों को अपने अंग