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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 84 of 187

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Page 84

७४ प्रत्यभिज्ञाहृदय गोपितसार्वात्म्यस्वरूपेण पशुहृदयव्यामोहिना भाति । पतिभूमिकायां तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन, अभेदनिश्चयाद्यात्मना गोचरीत्वेन, अभेदालोचनाद्यात्मना दिक्त्वरीत्वेन, स्वाङ्गकल्पाद्यप्रथा- सारप्रमेयात्मना च भूचरीत्वेन पतिहृदयविकासिना स्फुरति ! तथा च उक्तं सहजचमत्कारपरिजनिताकृतकादरेण भट्टदामोदरेण विमुक्तकेषु 'पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात्स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥' इति एवं च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम् । अपि च चिदात्मनः परमेश्वरस्य स्वा अनपायिनी एकैव स्फुरत्ता- सारकर्तृत्वात्मा ऐश्वर्यशक्तिः । सा यदा स्वरूपं गोपयित्वा पाशवे पदे के समान अभिन्न प्रकाश करना जिसका सार है ऐसे सामर्थ्यवाली भूचरी के रूप में पति (मुक्तदशा के जीव) के हृदय को विकसित करती हुई प्रका- शित होती है । भट्टदामोदर-जिसके प्रति उनके सहज चमत्कार (आध्यात्मिक आनन्द) से जनित (उत्पन्न) अकृत्रिम (स्वाभाविक) आदर होता है- अपने मुक्त स्तोत्रों में कहते हैं:- वामेश्वरी आदि शक्तियां (खेचरी के रूप में) प्रमाता में अवस्थित होकर, (गोचरी के रूप में) अन्तःकरण में अवस्थित होकर, (दिक्त्वरी के रूप में) बहिष्करणों (वाह्य इन्द्रियों) में अवस्थित होकर (भूचरी के रूप में) भावों (पदार्थों) में अवस्थित होकर (जीव को) परिज्ञान (पूर्णज्ञान) द्वारा पूर्ण बनाते हुए मुक्ति देती हैं और अज्ञान द्वारा उसे अवच्छिन्न (परिमित) बनाते हुए बन्धन में डालती हैं । इस प्रकार अपनी शक्तियों द्वारा व्यामोहित हो जाना ही (भ्रान्ति में पड़ जाना ही) संसारदशा है । (नीचे आगवोपाय का संकेत है ।) और भी चित्स्वरूप परमेश्वर की अपनी ऐश्वर्यशक्ति ११७ है जो नाशर- हित है, अनुपम है, जिसका सार स्फुरता ११८ (प्रकाश) है और जो कर्तृ तारूप ११९ है । वह (ऐश्वर्यशक्ति) जब अपने (वास्तविक) स्वरूप को छिपाकर पशु (परिमित प्रमाता बद्धजीव) की अवस्था में प्राण, अपान