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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 85 of 187

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प्राणापान-समान-शक्तिदशाभिः जाग्रत्स्वप्न-सुषुप्तभूमिभिः देहप्राण- पुर्यष्टककलाभिश्च व्यामोहयति, तदा तद्व्यामोहितता संसारित्वम् ; यदा तु मध्यधामोल्लासाम् उदानशक्तिं, विश्वव्याप्तिसारां च व्यान- शक्तिं, तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति, तदा देहाद्यवस्थायामपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति । एवं त्रिधा स्वशक्तिव्यामोहितता व्याख्याता । ‘चिद्वत्’ इति (६) सूत्रे चित्प्रकाशो गृहीतसंकोचः संसारी इत्युक्तम्, इह तु स्वशक्तिव्यामोहितत्वेन अस्य संसारित्वं भवति,-इति भङ्ग्यन्तरेण उक्तम्। एवं संकुचितशक्तिः प्राणा- दिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम् ‘..................शरीरी परमेश्वरः ।’ इत्याम्नायस्थित्या शिवभट्टारक एव,-इति भङ्ग्या निरूपितं भवति । और समान शक्ति१२० की दशाओं से जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की भूमियों से, देह, प्राण और पुर्यष्टक१२१ की कलाओं१२२ से व्यामोह उत्पन्न करती है तो यही व्यामोह संसार की दशा (जन्म-जन्मान्तर में संसरण करते रहना, (चक्कर काटते रहना ) है । जब वह ( ऐश्वर्यशक्ति ) चिदानन्दघनमय उदान१२३ शक्ति को जो मध्यधाम१२४ में विलसित होती है और जो तुर्य- दशावाली१२५ होती है, और चिदानन्दघनमय१२६ व्यानशक्ति को जो सम- स्त विश्व में व्याप्त हो जाती है और जो तुर्यातीतदशा वाली १२७ होती है उन्मीलित करती है, तब देह आदि के रहते हुए भी जीव पतिदशा१२८ में पहुँच जाता है और उसकी जीवन में ही मुक्ति हो जाती है । इस प्रकार अपनी शक्तियों से ही व्यामोहित हो जाना-इसकी तीन प्रकार से व्याख्या की गई है ‘चिद्वत्’ १२९ सूत्र में ( सूत्र ६ ) में यह कहा गया है कि चित्प्रकाश ही संकोच ग्रहण करके संसारी बन जाता है । यहाँ पर एक दूसरे दृष्टिकोण से यह कहा गया है कि अपनी शक्तियों द्वारा व्या- मोहित हो जाने से ही जीव की संसारदशा होती है । इस प्रकार जिसकी शक्ति संकुचित हो गई है ( अर्थात् अणु, जीव ) वह जब अपनी शक्तियों से व्यामोहित नहीं होता तब प्राण इत्यादि धारण करते हुए भी वह आम्नाय की दृष्टि से शरीर धारण किया हुआ परमेश्वर है, पूज्य शिव ही है—यह प्रकारान्तर से निश्चित रूप से कहा जा सकता है ।

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