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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages

Page 86 of 187

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Page 86

७६ प्रत्यभिज्ञाहृदय यदागमः मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वराः ।' इति । उक्तं च प्रत्यभिज्ञाटीकायाम् 'शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतया पश्यन्ति तेऽपि सिध्यन्ति ।' इति ॥ १२ ॥ उक्तसूत्रार्थप्रातिपक्ष्येण तत्त्वदृष्टिं दर्शयितुमाह तत्परिज्ञाने चित्तमेव अन्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहात् चितिः ॥ १३ ॥ पूर्वसूत्रव्याख्याप्रसङ्गेन प्रमेयदृष्ट्या वितत्य व्याख्यातप्रायमेतत् सूत्रम्; शब्दसंगत्या तु अधुना व्याख्यायते । 'तस्य' आत्मीयस्य पञ्च- कृत्यकारित्वस्य 'परिज्ञाने' सति अपरिज्ञानलक्षणकारणापगमात् स्व- शक्तिव्यामोहिततानिवृत्तौ स्वातन्त्र्यलाभात् प्राक् व्याख्यातं यत् 'चित्तं' जैसा कि आगम ने कहा है:— “मनुष्य के देह में स्थित होकर वे छिपे हुए परमेश्वर हैं” और ईश्वर- प्रत्यभिज्ञा की टीका १३० में कहा गया है:— “जो छत्तीसतत्त्वमय शरीर अथवा घट इत्यादि को शिव रूप से देखते हैं वे भी सिद्धि को प्राप्त करते हैं ।” उपर्युक्त सूत्र के अर्थ को विपर्यय द्वारा तत्त्वदृष्टि को बतलाने के लिए कहते हैं । सूत्र १३—उसके पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त १३१ ही अन्तर्मुखीभाव से चेतनपद १३२ पर पहुँच जाने से चिति १३३ हो जाता है । भाष्य—ज्ञेय की दृष्टि से पूर्वसूत्र की व्याख्या के प्रसंग में इस सूत्र की भी विस्तृत रूप से प्रायः व्याख्या हो ही गई है । शब्द संगति से इस सूत्र की अब व्याख्या की जा रही है । सूत्र में जो तत् शब्द आया है उसका अर्थ है आत्मा के पंचकृत्य करते रहने का । 'परिज्ञाने' का अर्थ है पूर्णज्ञान होने पर अर्थात् अज्ञानरूपी कारण के हट जाने पर, अपनी ही शक्ति के द्वारा व्योमोहित हो जाने के स्वभाव के चले जाने पर स्वातंत्र्य लाभ से,