प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य क्षेमराज
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Read in contextप्रत्यभिज्ञाहृदय ७७ तदेव संकोचिनीं बहिर्मुखतां जहत्, 'अन्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्या- रोहात्, -ग्राहकभूमिकाक्रमाक्रमेण संकोचकलाया अपि विगलनेन स्वरूपापत्त्या 'चितिर्' भवति; स्वां चिन्मयीं परां भूमिमाश्रयति इत्यर्थः ॥ १३ ॥ ननु यदि पारमार्थिकं चिच्छक्तिपदं सकलभेदकवलनस्वभावं, तत् अस्य मायापदेऽपि तथारूपेण भवितव्यं यथा जलदाच्छादितस्यापि भानोः भावावभासकत्वम् ।-इत्याशङ्क्य आह चितिवह्निरवरोहपदे छन्नोऽपि मात्रया मेयेन्धनं प्लुष्यति ॥ १४ ॥ पहले जिस चित्त की (सूत्र ५ में) व्याख्या हो चुकी है वही संकोचस्वभाव- वाली बहिर्मुखता को छोड़कर, अन्तर्मुखी भाव से चेतनपद पर चढ़कर अर्थात् क्रम से ज्ञाता (आत्मा) की भूमि तक उठ कर संकोच कला के विगलित हो जाने पर अपने (वास्तविक) स्वरूप की प्राप्ति से चिति हो जाता है । अर्थात् चित्त अपनी चिन्मयी परा भूमि में प्रवेश कर जाता है (चित्त अब अपनी परम अवस्था चित् में परिणत हो जाता है)। यहाँ पर एक शंका होती है (ननु) 'यदि पारमार्थिक चित् शक्ति का ऐसा स्वभाव है कि वह सब भेदों को कवलित कर लेती है तो मायावस्था में भी उसे वैसाही रहना चाहिए (अर्थात् उसे अपने स्वभाव को नहीं छोड़ना चाहिए; मायावस्था में भी अभेद की प्रतीति होनी चाहिए) जैसे मेघ से आच्छादित रहने पर भी सूर्य पदार्थों को प्रकाशित करता ही है । (अर्थात् पदार्थों को प्रकाशित करना सूर्य का स्वभाव है और मेघ से आच्छादित होने पर भी वह अपने इस स्वभाव को नहीं छोड़ता, पदार्थों को प्रकाशित करता ही रहता है । इसी प्रकार यदि चित् शक्ति का सब भेदों को विलीन कर अभेद को व्यक्त करना स्वभाव है, तो माया से आच्छादित रहने पर भी उसे अभेद की प्रतीति करानी चाहिए । यहाँ चिति की उपमा सूर्य से दी गई है और माया की मेघ से) इस शंका को उठाकर ग्रन्थकार कहते हैं:— सूत्र १४-चिति रूपी अग्नि अवरोह पद में (मायासे) आच्छादित रहने पर भी प्रमेय (ज्ञेय, पदार्थ) रूपी इन्धन को कुछ अंश में (कुछ सीमा तक) जला देती है ।