राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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पर सम्पूर्ण अधिकार नहीं हो जाता, तब तक आहार मे एक ग्रास की अल्पता या अधिकता सम्पूर्ण शरीर-यंत्र को बिल्कुल अप्रकृतिस्थ कर देगी। मन के पूर्ण रूप से अपने वश मे आने के बाद जो इच्छा हो, खाया जा सकता है। मन को एकाग्र करना आरम्भ करने पर देखोगे कि एक सामान्य पिन गिरने से ही ऐसा मालूम होगा मानो तुम्हारे मस्तिष्क मे से वज्र पार हो गया। इन्द्रिय-यंत्र जितने सूक्ष्म होते जाते हैं, अनुभूति भी उतनी ही सूक्ष्म होती जाती है। इन्ही सब अवस्थाओ मे से होते हुए हमें क्रमशः अग्रसर होना होगा। और जो लोग अध्यवसाय के साथ अन्त तक लगे रह सकते हैं, वे ही कृतकार्य होगे। सब प्रकार के तर्क और चित्त मे विक्षेप उत्पन्न करनेवाली बातो को दूर कर देना होगा। शुष्क और निरर्थक तर्कपूर्ण प्रलाप से क्या होगा? वह केवल मन के साम्यभाव को नष्ट करके उसे चंचल भर कर देता है। इन सब तत्त्वो की उपलब्धि की जानी चाहिए। केवल बातो से क्या होगा? अतएव सब प्रकार की बकवास छोड़ दो। जिन्होने प्रत्यक्ष अनुभव किया है, केवल उन्ही के लिखे ग्रन्थ पढ़ो।
शुक्ति के समान बनो। भारतवर्ष मे एक सुन्दर किम्बदन्ती प्रचलित है। वह यह कि आकाश मे स्वाति नक्षत्र के तुंगस्थ रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूँद किसी सीपी मे चली जाय, तो उसका मोती बन जाता है। सीपियो को यह मालूम है। अतएव जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपियाँ पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं, और उस समय की एक अनमोल बूँद की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्योही एक बूँद पानी उनके पेट में जाता है, त्योही उस जलकण को लेकर मुँह बन्द करके वे समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं और वहाँ बड़े धैर्य