राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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से होकर जाना पडेगा, और जितनी जल्दी हम उसे पार कर जायँ, उतना ही मगल है । पर यह सदैव स्मरण रहे कि हमारी यह वर्तमान अवस्था ही सबसे ऊँची अवस्था नही है ।
यहाँ यह बात समझना सचमुच कठिन है कि जिस निर्विशेष अवस्था को सबसे ऊँची अवस्था कही जाती है, वह, जैसा कि बहुतसे लोग शका करते है, पत्थर या अर्धजन्तु-अर्धवृक्ष-वत् कोई जीवविशेष के समान नही है । जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके मत से संसार भर के सारे अस्तित्व केवल दो भागो मे विभक्त है—एक तो वह, जो पत्थर आदि के समान जड की अवस्था है, और दूसरा वह, जो विचार या चिन्तन की अवस्था है । किन्तु हम उनसे पूछते है कि सारे अस्तित्व को इन दो ही भागो मे सीमित कर देने का उन्हे क्या अधिकार है ? क्या विचार से अनन्तगुनी अधिक ऊँची और कोई अवस्था नही है ? आलोक का कम्पन अत्यन्त मृदु होने पर वह हमे दृष्टिगोचर नही होता । जब वह कम्पन अपेक्षाकृत कुछ तीव्र होता है, तब वह हमारी दृष्टि का विषय हो जाता है—तब हमारी आँखों के सामने वह आलोक के रूप मे दीख पडता है । पर जब वह और भी तीव्र हो जाता है, तब हम पुन उसे नही देख पाते । वह हमे अन्धकार के समान ही प्रतीत होता है । तो क्या यह बाद का अन्धकार उस पहले अन्धकार के समान है ? नही, कभी नही, उन दोनो मे तो दो ध्रुवो का—जमीन-आसमान का—अन्तर है । क्या पत्थर की विचारशून्यता और भगवान की विचारशून्यता दोनो एक है ? बिलकुल नही । भगवान सोचते नही—वे विचार करते नही । वे भला करेगे भी क्यो ? उनके लिए क्या कुछ अज्ञात है, जो वे विचार करेगे ? पत्थर विचार कर सकता नही,