राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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और ईश्वर विचार करते नही—बस यही अन्तर है। ये पूर्वोक्त दार्शनिकगण सोचते है कि विचार से राज्य के बाहर जाना अत्यन्त भयानक बात है। वे विचार के अतीत कुछ भी नही पाते।
युक्ति के राज्य के उस पार बहुतसी उच्चतर अवस्थाएँ है। वास्तव में धर्म-जीवन की पहली अवस्था तो बुद्धि की सीमा लांघने पर शुरू होती है। जब तुम विचार, बुद्धि, युक्ति—इन सबके परे चले जाते हो, तभी तुमने भगवत्प्राप्ति के पथ में पहला कदम रखा है। वही जीवन का सच्चा प्रारम्भ है। जिसे हम साधारणत जीवन कहते है, वह तो असल जीवन की भ्रूण-अवस्था मात्र है।
अब प्रश्न हो सकता है कि विचार और युक्ति के अतीत की अवस्था ही सबसे ऊँची अवस्था है, इसका क्या प्रमाण? पहले तो, संसार के श्रेष्ठ महापुरुषगण—कोरी लम्बी-चौड़ी हाँकने-वालो की अपेक्षा कही श्रेष्ठ महापुरुषगण, जिन्होने अपनी शक्ति के बल से सम्पूर्ण जगत् को हिला दिया था, जिनके हृदय में स्वार्थ का लेश मात्र न था, जगत् के सामने घोषणा कर गए हैं कि हमारा यह जीवन उस सर्वातीत अनन्तस्वरूप मे पहुँचने के लिए रास्ते मे केवल एक सराय के समान है। दूसरे, उन्होंने केवल मुखसे ऐसा कहा हो, सो नही, वरन् उन्होंने सभी को वहाँ जाने का रास्ता बतला दिया है, अपनी साधन-प्रणाली सभी को समझा दी है, जिससे सब लोग उनका पदानुसरण कर आगे बढ सके। तीसरे, पहले जो व्याख्या दी गई है, उसके छोड जीवन-समस्या की और किसी प्रकार से सन्तोषजनक व्याख्या नही दी जा सकती। यदि मान लिया जाय कि इसकी अपेक्षा उच्चतर अवस्था और कोई नही है, तो भला हम लोग चिरकाल इस चक्र के भीतर से क्यो जा रहे है? किस युक्ति के आधार पर