राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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इस दृश्यमान जगत् की व्याख्या की जाय ? यदि हममे इससे अधिक दूर जाने की शक्ति न रहे, यदि हमारे लिए इसकी अपेक्षा कुछ अधिक चाहने को न रहे, तब तो यह पंचेन्द्रिय-ग्राह्य जगत् ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा रह जायगा। इसी को अज्ञेयवाद कहते हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि इन इन्द्रियो की गवाही मे विश्वास करने के लिए भला हमारे पास कौनसी युक्ति है ? मैं तो उन्ही को यथार्थ अज्ञेयवादी कहूँगा, जो रास्ते मे चुप खडे रहकर मर सकते है। यदि युक्ति ही हमारा सर्वस्व हो, तो वह तो - हमें इस शून्यवाद को लेकर संसार मे स्थिर होकर कही रहने न देगी। यदि कोई धन और नाम-यश की स्पृहा के छोड शेष सभी विषयो के सम्बन्ध मे आस्थाहीन हो, तो वह केवल पाखण्डी है। कॉन्ट (Kant) ने निःसन्दिग्ध रूप से प्रमाणित किया है कि हम युक्तिरूपी दुर्भेद्य दीवार का अतिक्रमण कर उसके उस पार नही जा सकते। किन्तु भारत मे तो समस्त विचारधाराओ की पहली बात है—युक्ति के उस पार चले जाना। योगीगण अत्यन्त साहस के साथ इस राज्य की खोज में प्रवृत्त होते है, और अन्त में ऐसी एक अवस्था को प्राप्त करने मे सफल होते हैं, जो समस्त युक्ति-विचार के परे है और केवल जिसमे ही हमारी वर्तमान परिदृश्यमान अवस्था का स्पष्टीकरण मिलता है। यही लाभ है उसके अध्ययन से, जो हमें जगत् के अतीत ले जाता है।
“तुम हमारे पिता हो, तुम हमे अज्ञान के उस पार ले जाओगे ॥”
“त्वं हि न. पिता, योऽस्माकमविद्याया. पर पार तारयसि ॥”*
यही धर्मविज्ञान है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी यथार्थ धर्मविज्ञान नाम के योग्य नही हो सकता।
* प्रश्नोपनिषद्, ६।८