राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 145 of 307
Read in context१२८ राजयोग
हो—मन तो केवल एक करण अर्थात् यन्त्र मात्र है, जिसके द्वारा तुम बाह्य जगत् की उपलब्धि करते हो। इस पुस्तक की ही बात लो, बाहर मे इसका पुस्तकरूपी अस्तित्व नही है। बाहर मे वस्तुत जो है, वह तो अज्ञात और अज्ञेय है। वह केवल स्फूर्ति (सकेत) देनेवाला कारण मात्र है। जैसे पानी में एक पत्थर फेंकने पर पानी प्रवाहाकार में बँटकर उस पत्थर पर प्रतिघात करता है, ठीक वैसे ही वह अज्ञात वस्तु जाकर मन मे आघात प्रदान करती है, और मन से पुस्तक के रूप में एक प्रतिक्रिया होती है। यथार्थ वहिर्जगत् तो स्फूर्ति देनेवाला कारण मात्र है, जिससे मानसिक प्रतिक्रिया होती है। एक पुस्तक का रूप, हाथी का रूप या मनुष्य का रूप बाहर में कोई अस्तित्व नही रखता, हम जो कुछ जानते हैं, वह बाहर की स्फूर्ति से होनेवाली हमारी मानसिक प्रतिक्रिया मात्र है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा है— “अनुभव की नित्य सम्भाव्यता का नाम जड पदार्थ है।” बाहर मे जो है, वह है केवल इस प्रतिक्रिया को उत्पन्न करनेवाली स्फूर्ति मात्र। उदाहरणार्थ, मोती की एक सीप को लो। तुम लोग जानते हो, मोती किस तरह पैदा होता है। बालुका का एक कण * या अन्य कोई चीज़ सीप मे घुस जाती है और उसमें क्षोभ उत्पन्न करने लगती है। इससे वह सीप उस बालुका-कण के चारो ओर 'एनामेल' के समान एक प्रकार का लेप-सा डालने लगती है। बस उसी से मोती तैयार होता है। यह सारा अनुभवात्मक जगत् मानो हमारे अपने उस लेप के समान है,
* वैज्ञानिको के मतानुसार, लोगो में प्रचलित बालुका-कण से मोती की उत्पत्ति सम्बन्धी विश्वास की कोई दृढ भित्ति नही है, सम्भवत क्षुद्र कीटाणुविशेष (Parasites) से मोती की उत्पत्ति होती है।