राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 146 of 307
Read in contextपातंजल-योगसूत्र १२९
'और यथार्थ जगत् मानो वह बालुका-कण है। सामान्य मनुष्य उसे कभी समझ न सकेगा, क्योकि जब कभी वह उसे समझने की कोशिश करता है, त्योही वह बाहर मे मानो अपना लेप डालने लगता है, और बस अपने उस लेप को ही देखता है। अब हम समझे कि वृत्ति का सच्चा अर्थ क्या है। मनुष्य का जो असल स्वरूप है, वह मन के अतीत है। मन तो उसके हाथो एक यन्त्रस्वरूप है। उसी का चैतन्य इस मन के भीतर मे से होकर आ रहा है। जब तुम इस मन के पीछे द्रष्टा-रूप से अवस्थित रहते हो, तभी वह चैतन्यमय होता है। जब मनुष्य इस मन को बिल्कुल त्याग देता है, तो उस मन का सम्पूर्ण नाश हो जाता है, उसका अस्तित्व ही नही रह जाता। अब समझ मे आया कि चित्त का क्या तात्पर्य है। वह मन का उपादान-स्वरूप है, और वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे और तरगे है। जब बाहर के कुछ कारण उस पर कार्य करने लगते है, त्योही वह तरग-रूप धारण कर लेता है। हम जिसे जगत् कहते हैं, वह तो इन वृत्तियो की समष्टि मात्र है।
हम लोग सरोवर की तली को नही देख सकते, क्योकि उसकी सतह छोटी-छोटी लहरो से व्याप्त रहती है। उस तली की झलक मिलना तभी सम्भव है, जब ये सारी लहरे शान्त हो जायें और पानी स्थिर हो जाय। यदि पानी गँदला हो, या सारे समय उसमे हलचल होती रहे, तो वह तली कभी दिखाई न देगी। पर यदि पानी निर्मल हो और उसमें एक भी लहर न रहे, तब हम उस तली को अवश्य देख सकेंगे। यह चित्त मानो उस सरोवर के समान है और हमारा असल स्वरूप मानो उसकी तली है, वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे है। फिर यह भी
९