राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 162 of 307
Read in contextपातजल-योगसूत्र १४५
नही होता। जिस मनुष्य ने इस अवस्था की प्राप्ति कर ली है, उसे वेदो मे 'विदेह' कहा गया है। ऐसा व्यक्ति स्वयं का स्थूल देह से रहित रूप में चिन्तन कर सकता है, पर तो भी उसे स्वयं को एक सूक्ष्मशरीरधारी के रूप मे सोचना ही पडता है। जो लोग इस अवस्था मे रहते हुए, उस परमपद की प्राप्ति बिना किए, प्रकृति मे लीन हो जाते है, उन्हे प्रकृतिलय कहते है, पर जो लोग इस प्रकार के सूक्ष्म भोग-सुख से भी सन्तुष्ट नही होते, वे ही चरम लक्ष्य—मुक्ति— प्राप्त करते है।
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥१८॥
सूत्रार्थ—दूसरे प्रकार की समाधि में समस्त मानसिक क्रियाओ के विराम का सतत अभ्यास किया जाता है, (उसमें व्युत्थान-प्रत्ययहीन) संस्कार-मात्र ही शेष रहता है।
व्याख्या—यही वह पूर्ण ज्ञानातीत असम्प्रज्ञात समाधि है, जो हमें मुक्त कर देती है। पहले जिस समाधि की बात कही गई है, वह हमे मुक्ति नही दे सकती—आत्मा को मुक्त नही कर सकती। भले ही कोई मनुष्य समस्त शक्तियां प्राप्त कर ले, पर तो भी उसका पतन हो सकता है। जब तक आत्मा प्रकृति के अतीत होकर सम्प्रज्ञात समाधि के भी बाहर नही चली जाती, तब तक पतन का भय बना ही रहता है। यद्यपि इसकी साधन-प्रणाली बहुत सरल मालूम होती है, पर इसे प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। यह साधन-प्रणाली ऐसी है कि इसमें स्वयं मन पर ध्यान करना पडता है, और जब कभी कोई विचार उठता है, तो तत्क्षण उसे दबा देना पडता है; मन के अन्दर किसी प्रकार के विचार को स्थान न देकर उसे सम्पूर्णतया शून्य कर देना पड़ता है। जब हम सचमुच यह करने मे समर्थ हो जायेंगे,
१०