राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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तो बस उसी क्षण हम मुक्त हो जायेंगे। जो लोग पूर्व-साधन या पूर्व-तैयारियाँ किए बिना ही मन को शून्य करने का प्रयत्न करते हैं, उनका मन अज्ञानात्मक तमोगुण से आवृत हो जाता है, और वह उनके मन को आलसी एव अकर्मण्य कर देता है, यद्यपि वे सोचते हैं कि वे मन को शून्य कर रहे हैं। इसके साधन में सचमुच समर्थ होना उच्चतम शक्ति का प्रकाश है—मन को शून्य करने में समर्थ होना यानी सयम की चरमावस्था प्राप्त कर लेना है। जब इस असम्प्रज्ञात या ज्ञानातीत अवस्था की प्राप्ति हो जाती है, तब यह समाधि निर्बीज हो जाती है। समाधि के निर्बीज होने का तात्पर्य क्या है ? सम्प्रज्ञात समाधि मे चित्त-वृत्तियो का केवल दमन भर होता है, पर तब भी वे सस्कार या वीजाकार मे विद्यमान रहती हैं। अवसर पाते ही वे पुन तरगा-कार मे प्रकट हो जाती हैं। पर जब सस्कारो को भी निर्मूल कर दिया जाता है, जब मन को भी लगभग नष्ट कर दिया जाता है, तब समाधि निर्बीज हो जाती है, तब मन मे ऐसा कोई सस्कार-बीज नही रह जाता, जिससे यह जीवन-लता फिर से लहलहा सके, जिससे यह अविराम जन्म-मृत्यु का चक्र और भी घूम सके।
तुम लोग पूछ सकते हो कि वह फिर ऐसी कौनसी अवस्था है, जहाँ मन नही, जिसमें कोई ज्ञान नही ? जिसे हम ज्ञान कहते हैं, वह तो उस ज्ञानातीत अवस्था की तुलना मे एक निम्नतर अवस्था मात्र है। यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि किसी विषय की सर्वोच्च और सर्वनिम्न अवस्थाएँ प्राय एक ही प्रकार की मालूम होती हैं। ईथर (आकाश-तत्त्व) का कम्पन मृदुतम होने से उसे अन्धकार कहते हैं, फिर उसका उच्चतम कम्पन भी