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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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१४८ राजयोग

जान पाता है कि न वह कहीं से आया था, न कही गया, वह तो प्रकृति थी, जो यहाँ-वहाँ आना-जाना कर रही थी, और प्रकृति की यह हलचल ही आत्मा मे प्रतिबिम्बित हो रही थी। काच मे से प्रतिबिम्बित होकर प्रकाश दीवाल पर पडता है और हिलता-डुलता है। दीवाल मूर्ख के समान शायद सोचती हो कि मै ही हिल-डुल रही हूँ। ठीक ऐसा ही हम सबो के बारे मे भी है, चित्त ही लगातार इधर-उधर जा रहा है, अपने को नाना रूपो मे परिणत कर रहा है, पर हम लोग सोचते हैं कि हमी ये विभिन्न रूप धारण कर रहे है। असम्प्रज्ञात समाधि के अभ्यास से यह सारा अज्ञान दूर हो जायगा। जब वह मुक्त आत्मा कोई आदेश देगी—भिखारी की भाँति प्रार्थना करेगी या माँगेगी नही, वरन् आदेश देगी—तब वह जो कुछ चाहेगी, सब तुरन्त पूर्ण हो जायगा, वह जो कुछ इच्छा करेगी, वही करने मे समर्थ होगी। साख्यदर्शन के मतानुसार ईश्वर का अस्तित्व नही है। यह दर्शन कहता है कि जगत् का कोई ईश्वर नही रह सकता, क्योकि यदि वह रहे, तो अवश्य वह एक आत्मा ही होना चाहिए, और आत्मा या तो बद्ध होगी या मुक्त। जो आत्मा प्रकृति के अधीन है, प्रकृति ने जिस पर अपना आधिपत्य जमा लिया है, वह भला कैसे सृष्टि कर सकेगी ? वह तो स्वय एक दास है। और दूसरी ओर, यदि आत्मा मुक्त हो, तो वह क्योकर इस जगत्-प्रपञ्च की रचना करेगी, क्यो इस पूरे ससार की क्रिया आदि का सचालन करेगी ? उसकी तो कोई अभिलाषा नही रह सकती, अत उसके सृष्टि या जगत्-शासन आदि करने का कोई प्रयोजन नही रह जाता। द्वितीयत, यह साख्यदर्शन कहता है कि ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करने की