राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र १४९
कोई आवश्यकता नही है। प्रकृति को मानने से ही जब सभी का स्पष्टीकरण हो जाता है, तो फिर किसी ईश्वर को लाने की आवश्यकता क्या ? कपिल मुनि कहते है कि बहुतसे व्यक्ति ऐसे हैं, जो सिद्धावस्था के नजदीक जाकर भी विभूति-लाभ की वासना पूर्णतया छोडने मे समर्थ न होने के कारण योगभ्रष्ट हो जाते है। उनका मन कुछ काल तक प्रकृति मे लीन होकर रहता है, जब वे पुन पैदा होते है, तब प्रकृति के मालिक होकर आते है। यदि इन्हे ईश्वर कहो, तो ऐसे ईश्वर अवश्य हैं। हम सभी एक समय ऐसा ईश्वरत्व प्राप्त करेगे। साख्यदर्शन के मतानुसार, वेद मे जिस ईश्वर की बात कही गई है, वह ऐसी ही एक मुक्तात्मा का वर्णन मात्र है। इसके अतिरिक्त जगत् का अन्य कोई नित्यमुक्त, आनन्दमय सृष्टिकर्ता नही है। दूसरी ओर, योगीगण कहते है, "नही, ईश्वर है, अन्य सभी आत्माओ से—सभी पुरुषो से अलग एक विशेष पुरुष है, वे समग्र सृष्टि के नित्य प्रभु है, वे नित्यमुक्त हैं और सभी गुरुओ के गुरुस्वरूप है।" साख्यमतवाले जिन्हे प्रकृतिलय कहते है, योगीगण उनका भी अस्तित्व स्वीकार करते हैं। वे कहते है कि ये योगभ्रष्ट योगी है। कुछ समय तक के लिए उनकी चरम लक्ष्य की ओर गति मे बाधा होती है, और उस समय वे जगत के अंशविशेष के अधिपति-रूप से अवस्थान करते है।
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१९॥
सूत्रार्थ—( यह समाधि यदि परवैराग्य के साथ अनुष्ठित न हो, तो ) वही देवताओं और प्रकृतिलीनों की पुनरुत्पत्ति का कारण है।
व्याख्या—भारतीय धर्मप्रणालियो में देवता का तात्पर्य है—कुछ उच्चपदस्थ व्यक्ति। भिन्न-भिन्न जीवात्मा एक के बाद