राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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र्जगत् मे करता है, मनस्तत्त्वान्वेषी उसी का मन पर करते हैं। इसके लिए काफी अभ्यास आवश्यक है। बचपन से हमने केवल बाहरी वस्तुओ मे मनोनिवेश करना सीखा है, अन्तर्जगत् मे मनोनिवेश करने की शिक्षा नहीं पाई। इसी कारण हममे से अधिकांश अन्तर्यन्त्र की निरीक्षण-शक्ति खो बैठे है। मन को अन्तर्मुखी करना, उसकी बहिर्मुखी गति को रोकना, उसकी समस्त शक्तियो को केन्द्रीभूत कर उस मन के ही ऊपर उनका प्रयोग करना, ताकि वह अपना स्वभाव समझ सके, अपने आपको विश्लेषण करके देख सके—एक अत्यन्त कठिन कार्य है। पर इस विषय मे वैज्ञानिक प्रथा के अनुसार अग्रसर होने के लिए वही तो एकमात्र उपाय है।
इस तरह के ज्ञान की उपयोगिता क्या है ? पहले तो, ज्ञान ही ज्ञान का सर्वोच्च पुरस्कार है, दूसरे, इसकी उपयोगिता भी है—यह समस्त दु खो का हरण करेगा। जब मनुष्य अपने मन का विश्लेषण करते-करते ऐसी एक वस्तु के साक्षात् दर्शन कर लेता है, जिसका किसी काल मे नाश नही, जो स्वरूपतः नित्यपूर्ण और नित्यशुद्ध है, तब उसको फिर दु ख नही रह जाता, उसका सारा विषाद न जाने कहाँ गायब हो जाता है। भय और अपूर्ण वासना ही समस्त दु खो का मूल है। पूर्वोक्त अवस्था के प्राप्त होने पर मनुष्य समझ जाता है कि उसकी मृत्यु किसी काल मे नही है, तब उसे फिर मृत्यु-भय नही रह जाता। अपने को पूर्ण समझ सकने पर असार वासनाएँ फिर नही रहती । पूर्वोक्त कारणद्वय का अभाव हो जाने पर फिर कोई दु ख नही रह जाता। उसकी जगह इसी देह मे परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है।
ज्ञानलाभ का एकमात्र उपाय है एकाग्रता। रसायन तत्त्वान्वेषी अपनी प्रयोगशाला मे जाकर अपने मन की समस्त शक्तियों