राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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को केन्द्रीभूत करके, जिन वस्तुओ का वह विश्लेषण करता है, उन पर प्रयोग करता है, और इस प्रकार वह उनके रहस्य जान लेता है। ज्योतिषी अपने मन की समुदाय शक्तियों को एकत्र करके दूरबीन के भीतर से आकाश मे प्रक्षिप्त करता है, और बस त्योही सूर्य, चन्द्र और ताराएँ अपना-अपना रहस्य उसके निकट खोल देती हैं। मै जिस विषय पर बातचीत कर रहा हूँ, उस विषय मे मैं जितना मनोनिवेश कर सकूँगा, उतना ही उस विषय का गूढ तत्त्व तुम लोगो के निकट प्रकट कर सकूँगा। तुम लोग मेरी बात सुन रहे हो, तुम लोग जितना इस विषय मे मनोनिवेश करोगे, उतनी ही मेरी बात की स्पष्ट रूप से धारणा कर सकोगे।
मन की शक्तियो को एकाग्र करने के सिवा अन्य किस तरह ससार मे ये समस्त ज्ञान उपलब्ध हुए है ? यदि प्रकृति के द्वार पर आघात करना मालूम हो गया—उस पर कैसे धक्का देना चाहिए, यह ज्ञात हो गया, तो बस प्रकृति अपना सारा रहस्य खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता एकाग्रता से ही आती है। मानव-मन की शक्ति की कोई सीमा नही। वह जितना ही एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर आती है, बस यही रहस्य है।
मन को बाहरी विषय पर स्थिर करना अपेक्षाकृत सहज है। मन स्वभावत बहिर्मुखी है। किन्तु धर्म, मनोविज्ञान अथवा दर्शन के विषय मे ऐसा नही है। यहाँ तो ज्ञाता और ज्ञेय (विषयी और विषय) एक है। यहाँ प्रमेय (विषय) एक अन्दर की वस्तु है--मन ही यहाँ प्रमेय है। मनस्तत्त्व का अन्वेषण करना ही यहाँ प्रयोजन है, और मन ही मनस्तत्त्व के अन्वेषण का कर्ता है।