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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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पातंजल-योगसूत्र—४ २५१

कि वे फिर मोड़े नही जा सकते। सारे जीवनभर उन्हें खडा ही रहना पड़ता है। मैने एक समय ऊपर हाथ उठाए हुए एक व्यक्ति को देखा था। मैने उससे पूछा, "जब तुम पहले-पहल इसका अभ्यास करते थे, तब तुम्हे कैसा लगता था?" उसने कहा, "पहले-पहल भयानक पीड़ा मालूम होती थी, इतनी कि मुझे नदी मे जाकर पानी में डूबे रहना पड़ता था, उससे कुछ समय के लिए पीड़ा थोडी कम मालूम होती थी। एक महीने बाद फिर कोई विशेष कष्ट नही हुआ।" इस प्रकार के अभ्यास से विभूतियां प्राप्त होती है।

समाधि—यही यथार्थ योग है, इस शास्त्र का यही मुख्य विषय है—और यही सिद्धि का प्रधान साधन है। पहले जिन सबके वारे में कहा गया है, वे गौण साधन मात्र है। उनके द्वारा वह परमपद प्राप्त नही होता। समाधि के द्वारा हम मानसिक, नैतिक या आध्यात्मिक, जो कुछ चाहे सब प्राप्त कर सकते हैं।

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥

सूत्रार्थ—(यह) एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना रूप जात्यन्तरपरिणाम प्रकृति के पूर्ण होने से होता है।

**व्याख्या—**पतंजलि ने कहा है कि ये शक्तियाँ जन्म से प्राप्त होती हैं, कभी-कभी वे औषधिविशेष से भी प्राप्त होती है, फिर तपस्या से भी उन्हे पाया जा सकता है। उन्होने यह भी स्वीकार किया है कि इस शरीर को जब तक इच्छा हो, रखा जा सकता है। अभी वे यह बता रहे है कि यह शरीर एक जाति से दूसरी जाति मे परिणत क्यो होता है। वे कहते हैं कि यह प्रकृति के पूर्ण होने से होता है। अगले सूत्र मे वे इसकी व्याख्या करेगे।