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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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२६० | राजयोग

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥

सूत्रार्थ—सत् और असत् कर्म प्रकृति के परिणाम (परिवर्त्तन) के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं, वरन् ये उसकी बाधाओ को दूर कर देनेवाले निमित्त मात्र हैं—जैसे, किसान जब पानी के बहने में रुकावट डालनेवाली मेंड को तोड़ देता है, तो पानी अपने स्वभाव से ही बह जाता है।

व्याख्या—जब कोई किसान खेत मे पानी सींचने की इच्छा करता है, तब उसे अन्य किसी जगह से पानी लाने की आवश्यकता नही होती; खेत के समीपवर्ती जलाशय मे पानी संचित है, बीच में बाँध रहने के कारण पानी खेत मे नही आ पा रहा है। किसान उस बाँध को खोल भर देता है, और बस पानी गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार, अपने आप खेत में बह आता है। इसी प्रकार, सभी व्यक्तियो मे सब प्रकार की उन्नति और शक्ति पहले से ही निहित हैं। पूर्णता ही मनुष्य का स्वभाव है, केवल उसके किवाड़ बन्द हैं, वह अपना यथार्थ रास्ता नही पा रही है। यदि कोई इस बाधा को दूर कर सके, तो उसकी वह स्वाभाविक पूर्णता अपनी शक्ति के बल से अभिव्यक्त होगी ही। और तब मनुष्य अपने भीतर पहले से ही विद्यमान शक्तियो को प्राप्त कर लेता है। जब यह बाधा दूर हो जाती है और प्रकृति को अपनी अप्रतिहत गति प्राप्त हो जाती है, तब हम जिन्हे पापी कहते है, वे भी साधु के रूप में परिणत हो जाते हैं। स्वभाव ही हमे पूर्णता की ओर ले जा रहा है, कालान्तर में वह सभी को वहाँ ले जायगा। धार्मिक होने के लिए जो कुछ साधनाएँ और प्रयत्न हैं, वे सब केवल निषेधात्मक कार्य हैं—वे केवल बाधा को दूर कर देते हैं और इस प्रकार उस पूर्णता के किवाड़ खोल देते हैं, जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जो हमारा स्वभाव है।