राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र—४ २६५
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥
सूत्रार्थ—योगियों के कर्म शुक्ल भी नहीं और कृष्ण भी नहीं, (पर) दूसरों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं--शुक्ल, कृष्ण और मिश्र ।
व्याख्या—जब योगी इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेते हैं, तब उनके कार्य और उन कार्यों के फल उन्हें फिर बाँध नहीं सकते, क्योंकि उनमें वासना का संस्पर्श नहीं रह जाता । वे केवल कर्म किए जाते हैं । वे दूसरों के हित के लिए काम करते हैं, दूसरों का उपकार करते हैं, किन्तु वे उसके फल की चाह नहीं रखते । अत: वह उनके पास नहीं आता । पर साधारण मनुष्यों के लिए, जिन्हें यह सर्वोच्च अवस्था प्राप्त नहीं हुई है, कर्म त्रिविध होते हैं--कृष्ण (पापकर्म), शुक्ल (पुण्यकर्म) और मिश्र (पाप और पुण्य मिले हुए) ।
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८॥
सूत्रार्थ—इन त्रिविध कर्मों से प्रत्येक अवस्था में वे ही वासनाएँ प्रकाशित होती हैं, जो केवल उस अवस्था में प्रकाशित होने की योग्य हैं । (अन्य सब उस समय के लिए स्तम्भित रूप से रहती हैं ।)
व्याख्या—मान लो, मैंने पाप, पुण्य और मिश्रित, ये तीन प्रकार के कर्म किए । उसके बाद, मान लो, मेरी मृत्यु हो गई, और मैं स्वर्ग में देवता हो गया । मनुष्य-देह की वासना और देव-देह की वासना एक समान नहीं है । देव-शरीर खाना-पीना कुछ नहीं करता । यदि बात ऐसी हो, तो फिर आत्मा के जो पूर्व अभुक्त कर्म हैं, जो अपने फलस्वरूप खाने-पीने की वासना को जन्म देते हैं, वे सब भला कहाँ जाते हैं ? जब मैं देवता हो जाता हूँ, तब ये कर्म कहाँ रहते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वासना उपयुक्त अवस्था और क्षेत्र को पाने पर ही प्रकाशित